समय पर पहचान और इलाज से गंभीर बीमारी का खतरा हो सकता है कम
कानपुर। किडनी हमारे शरीर का महत्वपूर्ण अंग है। यह खून से अपशिष्ट पदार्थों और अतिरिक्त पानी को बाहर निकालने का काम करती है। किडनी की कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होने पर क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) हो सकती है। समय पर बीमारी की पहचान और इलाज न होने पर यह किडनी फेलियर का कारण बन सकती है। मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, साकेत के नेफ्रोलॉजी एवं रीनल ट्रांसप्लांट मेडिसिन विभाग की प्रिंसिपल डायरेक्टर डॉ. अलका भसीन ने बताया कि किडनी की बीमारी को अक्सर साइलेंट किलर कहा जाता है, क्योंकि शुरुआती चरण में इसके लक्षण दिखाई नहीं देते। ऐसे में नियमित जांच और समय पर इलाज बेहद जरूरी है।उन्होंने बताया कि क्रिएटिनिन खून में पाया जाने वाला एक अपशिष्ट पदार्थ है, जो मांसपेशियों की सामान्य गतिविधियों के दौरान बनता है। स्वस्थ किडनी इसे खून से छानकर पेशाब के जरिए शरीर से बाहर निकाल देती है। किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होने पर खून में क्रिएटिनिन का स्तर बढ़ सकता है। हालांकि, केवल क्रिएटिनिन की एक रिपोर्ट से किडनी की स्थिति का पूरी तरह आकलन नहीं किया जा सकता। इसके लिए डॉक्टर ईजीएफआर (eGFR) और अन्य जांचों की मदद लेते हैं।
डॉ. भसीन के अनुसार, 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों और डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापे या दिल की बीमारी से पीड़ित मरीजों को नियमित रूप से किडनी की जांच करानी चाहिए। जिन लोगों के परिवार में किडनी की बीमारी का इतिहास है, जिन्हें किडनी में पथरी की समस्या है या जो लंबे समय से दर्द निवारक दवाओं का सेवन करते हैं, उन्हें भी विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। उन्होंने कहा कि क्रिएटिनिन का स्तर कम करने के लिए कोई एक दवा सभी मरीजों में प्रभावी नहीं होती। इलाज का मुख्य उद्देश्य किडनी को नुकसान पहुंचाने वाले कारणों को नियंत्रित करना और बीमारी को बढ़ने से रोकना है। इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह के दवाएं लेने से बचना चाहिए। नियमित जांच, संतुलित खानपान और विशेषज्ञ की सलाह का पालन करके किडनी की सेहत का ध्यान रखा जा सकता है।