कानपुर। विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस के अवसर पर अकादमी ऑफ पीडियाट्रिक्स, कानपुर द्वारा समाज में जागरूकता बढ़ाने के लिए विशेष पहल की गई। बाल रोग विशेषज्ञों ने स्पष्ट संदेश दिया कि डाउन सिंड्रोम किसी प्रकार की बीमारी नहीं, बल्कि एक आनुवंशिक अवस्था (ट्राइसॉमी 21) है, जिसे सही देखभाल, शिक्षा और सामाजिक सहयोग के जरिए सकारात्मक जीवन में बदला जा सकता है।
कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने कहा कि समाज में अब भी डाउन सिंड्रोम को लेकर कई भ्रांतियां मौजूद हैं, जिन्हें दूर करना बेहद जरूरी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि “समावेशन दया नहीं, बल्कि हर बच्चे का अधिकार है।” यदि ऐसे बच्चों को समान अवसर, शिक्षा और प्रोत्साहन मिले, तो वे भी आत्मनिर्भर और सक्षम नागरिक बन सकते हैं।
चिकित्सकों ने आंकड़ों के माध्यम से स्थिति की गंभीरता को भी सामने रखा। उनके अनुसार भारत में हर 800 से 1000 जीवित जन्मों में एक बच्चा डाउन सिंड्रोम से प्रभावित होता है। देश में हर साल लगभग 30,000 से 37,000 ऐसे बच्चों का जन्म होता है। यह भी महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि हालांकि अधिक मातृ आयु में इसका जोखिम बढ़ता है, फिर भी भारत में करीब 80 प्रतिशत बच्चे 35 वर्ष से कम आयु की माताओं से जन्म लेते हैं।
विशेषज्ञों ने बताया कि इस अवस्था में सबसे अहम भूमिका प्रारंभिक पहचान और समय पर हस्तक्षेप की होती है। जन्म के तुरंत बाद जांच और नियमित स्वास्थ्य परीक्षण से बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है। स्पीच थेरेपी, फिजियोथेरेपी और विशेष शिक्षा जैसी सेवाएं बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सामान्य स्कूलों में पढ़ाई और खेलकूद गतिविधियों में भागीदारी से उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और सामाजिक जुड़ाव मजबूत होता है।
कार्यक्रम में सरकार की विभिन्न योजनाओं की जानकारी भी साझा की गई। इसमें ‘निरामया’ स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत एक लाख रुपये तक का कवरेज, ADIP योजना के माध्यम से सहायक उपकरण और शिक्षण सामग्री की उपलब्धता, समावेशी शिक्षा और दिव्यांग पेंशन जैसी सुविधाएं शामिल हैं। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लखनऊ और प्रयागराज में संचालित ‘स्पर्श’ और ‘ममता’ जैसे विशेष विद्यालयों में निःशुल्क शिक्षा, भोजन और चिकित्सा सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं।
अकादमी ऑफ पीडियाट्रिक्स, कानपुर ने समाज के सभी वर्गों से अपील की कि वे डाउन सिंड्रोम से प्रभावित बच्चों और व्यक्तियों के प्रति संवेदनशीलता दिखाएं, भेदभाव और पूर्वाग्रह को खत्म करें और उन्हें हर क्षेत्र में बराबरी का अवसर दें।
विशेषज्ञों ने अंत में यह संदेश दिया कि इन बच्चों को सहानुभूति नहीं, बल्कि स्वीकृति और साथ की जरूरत है। जब समाज उन्हें बराबरी का दर्जा देगा, तभी एक सशक्त, संवेदनशील और समावेशी राष्ट्र का निर्माण संभव हो सकेगा।
समावेशन दया नहीं, अधिकार: डाउन सिंड्रोम दिवस पर विशेषज्ञों का जागरूकता संदेश