कानपुर। गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक (जीएसवीएम) मेडिकल कॉलेज में गुरुवार को उत्तर प्रदेश फिजियोलॉजी कॉन्फ्रेंस (यूपी एसोपिकोन-2026) के प्रथम दिवस पर शैक्षणिक कार्यशालाओं और नवाचार से जुड़े कई सत्र आयोजित किए गए। कार्यक्रम का उद्देश्य चिकित्सा शिक्षा को व्यावहारिक ज्ञान, नवीन शोध तकनीकों और आधुनिक तकनीक जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से जोड़ना रहा। सम्मेलन में प्रदेश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों के संकाय सदस्यों, शोधार्थियों और चिकित्सकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
यह आयोजन मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य प्रो. डॉ. संजय कला के मार्गदर्शन और फिजियोलॉजी विभाग की नोडल इंचार्ज प्रो. डॉ. डॉली रस्तोगी के नेतृत्व में संपन्न हुआ। पूरे दिन विभिन्न विषयों पर कार्यशालाएं और प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए गए, जिनमें प्रतिभागियों को आधुनिक चिकित्सा शोध और तकनीकों की जानकारी दी गई।
सम्मेलन के पहले सत्र में “न्यूनतम संसाधनों में फिटनेस मूल्यांकन” विषय पर कार्यशाला आयोजित की गई। आईएमएस बीएचयू और एक्सेस मेडिसिन लैब के सहयोग से आयोजित इस चार घंटे के सत्र में डॉ. संकल्प झा और डॉ. आशीष कुमार गुप्ता ने बताया कि कम लागत या बिना मशीनों के भी ग्रामीण परिवेश में लोगों की फिटनेस का आकलन किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रयास ‘फिट इंडिया’ अभियान को बढ़ावा देने के साथ-साथ चयापचयी रोगों की रोकथाम में भी सहायक हो सकते हैं।
इसके बाद शोध पद्धति पर केंद्रित एक कार्यशाला में एम्स रायबरेली के डॉ. मुकेश शुक्ला और जीएसवीएम के डॉ. समरजीत कौर ने प्रतिभागियों को ‘जमोवी’ सॉफ्टवेयर के उपयोग का प्रशिक्षण दिया। इस सॉफ्टवेयर के माध्यम से शोध कार्यों के डेटा विश्लेषण को आसान बनाया जा सकता है, जिससे शोधार्थियों को अपने थीसिस और रिसर्च प्रोजेक्ट को प्रभावी ढंग से पूरा करने में मदद मिलती है। एक अन्य सत्र में डॉ. शिवम वर्मा ने जूनियर रेजिडेंट्स को एम्बुलेटरी ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग (एबीपीएम) की महत्ता के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि 24 घंटे की बीपी निगरानी से ऐसे मरीजों की पहचान संभव है जिनका रक्तचाप दिन में सामान्य रहता है लेकिन रात में बढ़ जाता है, जिसे ‘मास्क्ड हाइपरटेंशन’ कहा जाता है। इस तकनीक से समय रहते बेहतर उपचार संभव हो पाता है।
सम्मेलन में क्लिनिकल प्रैक्टिस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के उपयोग पर भी विशेष चर्चा हुई। इस सत्र में डॉ. नवदीप आहूजा ने बताया कि एआई का उपयोग लक्षणों के विश्लेषण और रोगों की पहचान में एक प्रभावी उपकरण के रूप में किया जा सकता है, विशेष रूप से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र और हृदय संबंधी रोगों के निदान में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि आज एआई डेटा एनालिसिस और रिसर्च के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला रहा है। पहले जिन कार्यों में महीनों लगते थे, वे अब कुछ दिनों में पूरे हो सकते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आम लोगों को एआई से सीधे चिकित्सीय सलाह लेने से बचना चाहिए। एआई को केवल एक सहायक उपकरण के रूप में उपयोग करना चाहिए और अंतिम निर्णय विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह से ही लेना चाहिए।
युवा शोधकर्ताओं को प्रोत्साहित करने के लिए अंडरग्रेजुएट छात्रों के लिए “वन मिनट फ्लैश टॉक चैलेंज” भी आयोजित किया गया। इसमें प्रदेश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों के छात्रों ने अपने नवाचारी शोध विचार प्रस्तुत किए। प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में डॉ. अमित वर्मा, डॉ. श्रद्धा वर्मा और डॉ. प्रियंका शुक्ला शामिल रहे। प्रतियोगिता में सिद्धि ने प्रथम, प्रथम ने द्वितीय और ध्रुव ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।
कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों ने इस आयोजन को ज्ञानवर्धक बताते हुए भविष्य में भी ऐसे शैक्षणिक और शोध आधारित कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने की बात कही। सम्मेलन को सफल बनाने में फिजियोलॉजी विभाग के सभी संकाय सदस्यों और रेजिडेंट डॉक्टरों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
जीएसवीएम में यूपी फिजियोलॉजी कॉन्फ्रेंस का आगाज