नई दिल्ली/अलीगढ़। भारतीय राजनीति के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद राजीव शुक्ला इन दिनों एक गंभीर कानूनी विवाद को लेकर सुर्खियों में हैं। मामला उनकी आधिकारिक जन्मतिथि को लेकर सामने आई दो अलग-अलग प्रविष्टियों का है, जिनमें दो वर्ष से अधिक का अंतर पाया गया है। इस प्रकरण में भ्रष्टाचार विरोधी संवैधानिक संस्था लोकपाल ने कड़ा रुख अपनाते हुए राज्यसभा सचिवालय से विस्तृत और प्रामाणिक रिकॉर्ड तलब किया है।
यह मामला अलीगढ़ निवासी शिकायतकर्ता प्रदीप सिंह द्वारा लोकपाल में दर्ज शिकायत संख्या 136/2025 से जुड़ा है। शिकायतकर्ता के अनुसार, राजीव शुक्ला के विभिन्न चुनावी हलफनामों और आधिकारिक रिकॉर्ड्स में जन्मतिथि को लेकर गंभीर विसंगति पाई गई है। पुराने रिकॉर्ड्स के अनुसार, जब राजीव शुक्ला उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से राज्यसभा सांसद रहे, तब उनकी जन्मतिथि 13 सितंबर 1959 दर्ज थी।
लेकिन वर्ष 2022 में, जब उन्होंने छत्तीसगढ़ से राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल किया, तो उनके शपथपत्र में जन्मतिथि बदलकर 20 जुलाई 1957 दर्ज पाई गई। इस बदलाव ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि दोनों तिथियों के बीच 2 वर्ष, 1 महीना और 24 दिन का अंतर है। खास बात यह है कि आमतौर पर उम्र कम दिखाने के आरोप सामने आते हैं, जबकि इस मामले में उम्र अधिक दर्शाई गई है, जो इसे और भी असामान्य बनाता है।
इस प्रकरण पर छत्तीसगढ़ के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी ने स्पष्ट किया है कि निर्वाचन आयोग स्वयं इस मामले में प्रत्यक्ष कार्रवाई नहीं कर रहा है, लेकिन शिकायतकर्ता को कानूनी मार्ग अपनाने की सलाह दी गई है। निर्वाचन आयोग के अनुसार, यदि नामांकन के समय शपथपत्र में गलत जानकारी दी गई हो, तो यह जन प्रतिनिधित्व कानून (RPA), 1951 की धारा 125A के अंतर्गत दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में सक्षम न्यायालय के माध्यम से कार्रवाई संभव है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए लोकपाल ने 03 फरवरी 2026 को जारी अपने आदेश में राज्यसभा सचिवालय को निर्देश दिया है कि सांसद राजीव शुक्ला से संबंधित सभी वास्तविक, मूल और प्रमाणिक दस्तावेज प्रस्तुत किए जाएं। लोकपाल इस बात की जांच करना चाहता है कि जन्मतिथि में यह अंतर किसी लिपिकीय त्रुटि का परिणाम है या फिर जानबूझकर दी गई गलत जानकारी।
इस हाई-प्रोफाइल मामले की अगली महत्वपूर्ण सुनवाई 17 मार्च 2026 को लोकपाल के समक्ष तय की गई है। इसी सुनवाई में राज्यसभा सचिवालय द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के आधार पर लोकपाल अपना अगला रुख स्पष्ट करेगा।
शिकायतकर्ता प्रदीप सिंह का कहना है कि यह मामला केवल एक तकनीकी या लिपिकीय गलती का नहीं हो सकता। उनका कहना है कि जब देश के एक वरिष्ठ सांसद के बुनियादी व्यक्तिगत विवरण ही संदिग्ध हों, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। उन्होंने कहा कि शपथपत्र एक कानूनी दस्तावेज होता है और इसकी शुचिता बनाए रखना हर जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी है।कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि जांच में यह सिद्ध हो जाता है कि नामांकन के दौरान जानबूझकर गलत जानकारी दी गई है, तो यह मामला केवल नैतिकता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सांसद की सदस्यता तक पर खतरा पैदा कर सकता है। ऐसी स्थिति में राजीव शुक्ला को कानूनी प्रक्रियाओं और संभावित दंडात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
फिलहाल, इस पूरे मामले में राजीव शुक्ला या उनके आधिकारिक पक्ष की ओर से कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। अब सभी की निगाहें 17 मार्च की लोकपाल सुनवाई और राज्यसभा सचिवालय की रिपोर्ट पर टिकी हुई हैं, जो इस विवाद की दिशा और दशा तय कर सकती है।