लखनऊ विधानसभा में 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन का भव्य शुभारंभ

लखनऊ।
उत्तर प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने आज विधानसभा, लखनऊ में 19 से 21 जनवरी 2026 तक आयोजित अखिल भारतीय 86वें पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन का भव्य उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों से पधारे विधानमंडलों के पीठासीन अधिकारियों, गणमान्य अतिथियों एवं जनप्रतिनिधियों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन किया।
राज्यपाल ने अपने संबोधन में कहा कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन होना अत्यंत गौरव का विषय है। यह सम्मेलन भारतीय संसदीय परंपराओं की सुदृढ़ता, मर्यादा और निरंतरता का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने कहा कि लखनऊ की तहज़ीब, संवाद और समन्वय की परंपरा इस आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान करती है।
राज्यपाल ने पीठासीन अधिकारियों को लोकतंत्र की आत्मा का संरक्षक बताते हुए कहा कि उनकी निष्पक्षता, विवेक और मर्यादा ही विधानमंडलों को जनआकांक्षाओं की प्रभावी अभिव्यक्ति का मंच बनाती है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह सम्मेलन अनुभवों के आदान-प्रदान, श्रेष्ठ संसदीय परंपराओं के संरक्षण और नवाचारों के सृजन का सशक्त माध्यम बनेगा।
उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और लोकतांत्रिक विरासत का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि यह प्रदेश वैदिक संस्कृति, दर्शन और लोकतांत्रिक चेतना का जीवंत केंद्र रहा है। प्रयागराज, अयोध्या, वाराणसी, मथुरा जैसी पावन धरा ने भारत की आत्मा और मूल्यों को दिशा दी है। उन्होंने कहा कि विधानमंडल जनआकांक्षाओं को स्वर देने का पवित्र मंच है और सदन की सार्थकता केवल बहसों की संख्या से नहीं, बल्कि लोककल्याण के प्रति दृष्टिकोण तथा तथ्यपूर्ण व समाधानपरक चर्चा से तय होती है।
राज्यपाल ने सदन की कार्यवाहियों में व्यवधान को गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि इससे जनहित के महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा बाधित होती है और लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास प्रभावित होता है। उन्होंने विचारों की भिन्नता को लोकतंत्र की शक्ति बताते हुए असहमति को लोकतांत्रिक सौंदर्य के रूप में स्वीकार करने का आह्वान किया।
इस अवसर पर राज्यपाल ने माननीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश विधानसभा श्री सतीश महाना के मार्गदर्शन में प्रकाशित पुस्तक ‘उत्तर प्रदेश विधान सभा की संसदीय पद्धति और प्रक्रिया’ की सराहना करते हुए कहा कि यह प्रकाशन लोकतांत्रिक मर्यादाओं और संसदीय अनुशासन का महत्वपूर्ण पथप्रदर्शक सिद्ध होगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सम्मेलन के दौरान गहन, संतुलित और सार्थक विचार-विमर्श होगा, जो संसदीय प्रणाली को और अधिक सशक्त, संवेदनशील और प्रभावी बनाएगा।
राज्यपाल ने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा विधानसभाओं की कार्यवाही की समय-सीमा निर्धारित किए जाने संबंधी सुझाव का उल्लेख करते हुए कहा कि यह एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने कहा कि कई बार सीमित अवधि में भी माननीय विधायकों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाता, इसलिए इस दिशा में गंभीरता से अमल किया जाना आवश्यक है। उन्होंने अपेक्षा जताई कि सम्मेलन के दौरान इस विषय पर ठोस निर्णय लिया जाएगा।
लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश आध्यात्मिक संस्कृति, स्वतंत्रता संग्राम, सांस्कृतिक चेतना और राजनीतिक ऊर्जा की भूमि रहा है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2015 में इसी विधानसभा में आयोजित सम्मेलन में जिन विषयों पर चर्चा हुई थी, आज 2026 में अधिकांश विधानसभाएं पेपरलेस हो चुकी हैं और कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण हो रहा है, जिससे पारदर्शिता बढ़ी है। इसके बावजूद लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता बनाए रखना हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है।
उपसभापति राज्यसभा श्री हरिवंश ने उत्तर प्रदेश को देश का हृदय प्रदेश बताते हुए कहा कि यह भूमि इतिहास, सभ्यता, संस्कृति और अध्यात्म की पावन धरा रही है। उन्होंने राज्यपाल के लंबे सार्वजनिक जीवन और प्रशासनिक अनुभव की सराहना करते हुए उन्हें विशेष रूप से महिला जनप्रतिनिधियों के लिए प्रेरणास्रोत बताया।
सम्मेलन के दौरान उत्तर प्रदेश की सामाजिक एवं सांस्कृतिक विरासत तथा समग्र विकास पर आधारित एक लघु फिल्म प्रदर्शित की गई और पुस्तक ‘उत्तर प्रदेश विधान सभा की संसदीय पद्धति और प्रक्रिया’ का विमोचन किया गया।
माननीय अध्यक्ष उत्तर प्रदेश विधानसभा श्री सतीश महाना ने स्वागत भाषण दिया, जबकि विधान परिषद के सभापति श्री कुंवर मानवेन्द्र सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। नेता प्रतिपक्ष श्री माता प्रसाद पाण्डेय ने भी सम्मेलन को संबोधित किया।
इस अवसर पर देश के सभी राज्यों की विधानसभाओं के अध्यक्ष, विधान परिषदों के सभापति, पीठासीन अधिकारी, उत्तर प्रदेश के मंत्री, सांसद, विधायक तथा अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।

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