मनीष गुप्ता
कानपुर शहर में अस्पताल तो कई हैं, पर एक नया ट्रेंड बड़ी तेज़ी से वायरल हो रहा है—गुटखा चिकित्सा पद्धति। इसमें डॉक्टर पहले गुटखा खाकर “ऊर्जा” लेते हैं, और फिर मरीज को देखते हैं। मानो गुटखा न हुआ, मेडिकल साइंस का पॉवर बैंक हो गया।
अस्पताल के बाहर बड़े-बड़े बोर्ड लगे हैं—
“यहां अनुभवी डॉक्टर—20 साल का गुटखा अनुभव!”
“गुटखा फ्री, मुस्कान पेड।”
जैसे ही डॉक्टर साहब कुर्सी पर बैठते हैं, पहला काम—गुटखे की पुड़िया को अंगूठे और तर्जनी के बीच से दबाकर प्रोफेशनल अंदाज़ में मुंह में रखना। देखते ही मरीज को भरोसा हो जाता है कि अब इलाज चल पड़ेगा।
कुछ मरीज तो कहते भी पाए गए—
“डॉक्टर साहब, जब तक आपकी आवाज़ में वो खास गुटखा बेस न आए, हमें लगता ही नहीं कि हम अस्पताल में आए हैं।”
डॉक्टर का स्टेथोस्कोप भी गुटखा सुगंधित रहता है।
जांच के दौरान आवाज़ आती है—
“आआह्ह… थूक… हां अब बताइए, क्या दिक्कत है?”
एक बार तो एक डॉक्टर ने गुटखा खाते-खाते मरीज को सलाह दी—
“देखो भाई, तुम तंबाकू बिलकुल मत खाना… सेहत के लिए बहुत खराब है।”
मरीज बोला—
“डॉक्टर साहब, फिर आप क्यों…?”
डॉक्टर ने गंभीरता से कहा—
“अरे, हम तो मेडिकल कारणों से खाते हैं। ये तो रिसर्च चल रही है।”
नर्सें भी आजकल खास ट्रेनिंग ले रही हैं—‘गुटखा-ओरिएंटेड कम्युनिकेशन स्किल्स’।
और वार्ड बॉय?
वो तो गुटखा के पैकेट को ऐसे हवा में उछालकर पकड़ते हैं जैसे कोई निंजा कलाकार हो।
कुछ अस्पतालों में तो हालात ये हैं कि मरीज पूछते हैं—
“डॉक्टर साहब, ऑपरेशन सफल रहा न?”
डॉक्टर बोलते हैं—
“सफल तो हो जाता अगर इधर थूकदान होता!”
गुटखा अस्पताल की उन्नति देखकर बाकी डॉक्टर भी सोच में पड़ गए हैं। शायद भविष्य में मेडिकल कॉलेजों में नया सब्जेक्ट जुड़ जाए—
BDS: Bachelor of Dental… and Supari
वैसे मज़ाक अपनी जगह, पर अगर ऐसा ही चलता रहा तो मरीजों को इलाज से ज़्यादा डर डॉक्टर के रेड स्पिट मार्क से लगेगा।