कानपुर 23 अगस्त खानकाहे हुसैनी के ज़ेरे एहतिमाम पैगम्बर ए इस्लाम के नवासे, जिगर गोशा ए रसूल जाने अली व बतूल हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम की यौम ए शहादत पर खानकाहे हुसैनी कर्नलगंज कानपुर महानगर हज़रत ख्वाजा सैय्यद दाता हसन सालार शाह की दरगाह पर मनकबत व नज़र पेशकर हज़रत इमाम हसन को खिराज ए अकीदत पेश की गयी।
बाद नमाज़ ए ज़ोहर खानकाहे हुसैनी में यौमे शहादत इमाम हसन का आगाज़ हाफिज़ मोहम्मद कफील हुसैन खाँ ने तिलावते कुरान ए पाक से किया। हज़रत ख्वाजा सैय्यद दाता हसन सालार शाह रह०अलै० की मज़ार पर गुलपोशी कर हज़रत इमाम हसन को खिराज ए अकीदत पेश की गयी उलेमा ए कराम ने बताया कि हज़रत सैय्यद इमाम हसन की शहादत 50 हिजरी सफ़र के महीने की 28 तारीख को हुई इमाम हसन जन्नत के नौजवानों के सरदार है उनकी सखावत पूरी दुनियां मे एक मिसाल है। नौजवानों को उनके बताए हुए रास्तों पर चलना चाहिए।
खादिम खानकाहे हुसैनी इखलाक अहमद डेविड ने कहा कि रसूल ए खुदा अपने नवासों इमाम हसन और इमाम हुसैन से बहुत मोहब्बत करते थे हमे भी अहले बैत से मोहब्बत करने के साथ-साथ उनके बताए हुए रास्ते पर चलना चाहिए आज मुसलमान कुरान हदीस नमाज़ से दूर होता जा रहा है जिस वज़ह से मुसलमान परेशान है। माँ-बाप की नाफरमानी करने वाली की इबादते भी अल्लाह को मंज़ूर नही माँ बाप को मोहब्बत से देखना भी इबादत में इसी तरह, इमाम हसन पड़ोसियों के साथ भी दया और सौम्यता से पेश आते पड़ोसी किसी धर्म से ही क्यों न हो जिसके परिणामस्वरूप पड़ोसी भी इस्लाम की ओर आकर्षित हो जाते। इमाम हसन के जीवन में करुणा और उदारता सबसे प्रमुख विशेषताएँ थीं। ये केवल उनके इमामत काल तक सीमित नहीं थीं, बल्कि मौला अली की खिलाफ़त के दौर में भी वे अपना हिस्सा दूसरों को दे दिया करते थे। हाफिज़ कफील हुसैन खाँ, हाफिज़ हसीब अहमद, फाज़िल चिश्ती, हाजी गौस रब्बानी, मोहम्मद शाहिद, मोहम्मद जावेद, एजाज़ रशीद, मोहम्मद हफीज़, मोहम्मद लारैब, जमालुद्दीन फारुकी, अबरार वारसी, हाफिज़ गुलाम वारिस, मोहम्मद फैज़ान कादरी, मोहम्मद रज़ा खान, अफज़ाल अहमद आदि थे।
पड़ोसी किसी भी धर्म का हो उसके साथ दया सौम्यता से पेश आएं