कानपुर में मौत के तहखानों का जाल, हजारों लोगों की जिंदगी रोज खतरे में
दिल्ली और लखनऊ अग्निकांड के बाद शुरू हुई कार्रवाई, लेकिन सवाल बरकरार—अवैध बेसमेंट आखिर बने कैसे?
कानपुर। राजधानी लखनऊ में हुए भीषण अग्निकांड में 15 लोगों की दर्दनाक मौत और उससे पहले दिल्ली में हुए हादसे के बाद कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) अचानक हरकत में आ गया है। शहरभर में अवैध बेसमेंटों की जांच, नोटिस और सीलिंग की कार्रवाई शुरू कर दी गई है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि वर्षों से चल रहे इन अवैध निर्माणों पर अब तक प्रशासन की नजर क्यों नहीं पड़ी? आखिर किसकी मिलीभगत से शहर के रिहायशी और व्यावसायिक इलाकों में मौत के ये तहखाने तैयार होते रहे?
शहर के लोगों का मानना है कि बिना विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की अनदेखी या मिलीभगत के इतने बड़े पैमाने पर अवैध बेसमेंट निर्माण संभव ही नहीं है। हर बार किसी बड़े हादसे के बाद कुछ दिनों तक कार्रवाई का दिखावा होता है, नोटिस जारी किए जाते हैं, कुछ भवनों को सील कर दिया जाता है, लेकिन समय बीतते ही पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। यही वजह है कि अवैध निर्माण करने वालों के हौसले लगातार बुलंद होते गए।
कोचिंग हब में छात्रों की जान जोखिम में
कानपुर का काकादेव क्षेत्र देश के प्रमुख कोचिंग हब में गिना जाता है। यहां हजारों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने आते हैं। लेकिन इन छात्रों की सुरक्षा को लेकर स्थिति बेहद चिंताजनक है। काकादेव, गीता नगर, रोशन नगर, विनायकपुर और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कोचिंग संस्थान बेसमेंट में संचालित हो रहे हैं।
नियमों के विपरीत कई मकान मालिकों ने बेसमेंट को छोटे-छोटे कमरों में बांटकर हॉस्टल बना दिए हैं। इन कमरों में वेंटिलेशन की उचित व्यवस्था नहीं है। कई स्थानों पर बेसमेंट में ही गैस सिलेंडर और चूल्हों के जरिए रसोई संचालित हो रही है। यदि किसी कारणवश आग लग जाए तो वहां मौजूद छात्रों के बाहर निकलने का रास्ता बेहद सीमित है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति किसी बड़े हादसे को जन्म दे सकती है।
जितनी इमारत ऊपर, उतनी ही जमीन के नीचे
कानपुर के पुराने बाजारों और व्यापारिक क्षेत्रों में अवैध बेसमेंट निर्माण का खेल वर्षों से चल रहा है। नयागंज, बिरहाना रोड, कलेक्टरगंज, मेस्टन रोड, नई सड़क और चमनगंज जैसे इलाकों में कई भवन ऐसे हैं जिनकी ऊंचाई जितनी ऊपर दिखाई देती है, उससे कहीं अधिक हिस्सा जमीन के नीचे बना हुआ है।
कई व्यापारिक प्रतिष्ठानों में दो से तीन मंजिल तक भूमिगत निर्माण कर गोदाम, शोरूम और कार्यालय संचालित किए जा रहे हैं। इन स्थानों पर प्रतिदिन हजारों ग्राहक और कर्मचारी आते-जाते हैं, लेकिन अग्निशमन सुरक्षा के मानकों का पालन शायद ही कहीं दिखाई देता है।
शहरभर में फैला है मौत का नेटवर्क
गोविन्द नगर की चावला मार्केट, साकेत नगर, गुमटी नंबर-5, नवीन मार्केट, पीपीएन मार्केट, शिवाला, बेगमगंज, कर्नलगंज, भूसा टोली, घसियारी मंडी, आर्य नगर, स्वरूप नगर, शक्कर पट्टी, हूलागंज, माल रोड और बिरहाना रोड समेत शहर के लगभग हर प्रमुख बाजार में अवैध बेसमेंटों का जाल फैला हुआ है।
इनमें से अधिकांश स्थानों पर आपातकालीन निकास (इमरजेंसी एग्जिट) की व्यवस्था नहीं है। आग लगने या किसी अन्य दुर्घटना की स्थिति में लोगों के लिए बाहर निकलना बेहद मुश्किल हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी बेसमेंट में पर्याप्त वेंटिलेशन, अग्निशमन उपकरण और वैकल्पिक निकास मार्ग होना अनिवार्य है, लेकिन अधिकांश भवन इन मानकों से कोसों दूर हैं।
अस्पतालों में भी खतरे का साया
सबसे गंभीर स्थिति निजी अस्पतालों की बताई जा रही है। शहर के अनेक अस्पतालों में बेसमेंट का उपयोग ओपीडी, वार्ड, पैथोलॉजी और अन्य चिकित्सा सेवाओं के लिए किया जा रहा है। यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में मरीज और तीमारदार मौजूद रहते हैं।
यदि किसी अस्पताल के बेसमेंट में आग लग जाए या धुआं भर जाए तो मरीजों को सुरक्षित बाहर निकालना लगभग असंभव हो सकता है। कई अस्पतालों में केवल एक सीढ़ी या लिफ्ट के सहारे आवागमन होता है। ऐसे में किसी भी आपदा की स्थिति में भारी जनहानि से इनकार नहीं किया जा सकता।
पार्किंग के नाम पर स्वीकृति, इस्तेमाल गोदाम के रूप में
नियमों के अनुसार व्यावसायिक भवनों और होटलों के बेसमेंट का उपयोग केवल पार्किंग के लिए किया जा सकता है। लेकिन कानपुर में यह नियम सिर्फ कागजों तक सीमित दिखाई देता है। जरनलगंज, काहूकोठी, हालसी रोड, गम्मू खां का हाता और कर्नलगंज जैसे इलाकों में पार्किंग के लिए स्वीकृत बेसमेंटों में गोदाम, दुकानें और व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं।
इसका सीधा असर यातायात व्यवस्था पर भी पड़ रहा है। पार्किंग की जगह कब्जा होने से वाहन सड़कों पर खड़े होते हैं, जिससे जाम की समस्या बढ़ती है और आपातकालीन वाहनों के लिए रास्ता बाधित होता है।
कार्रवाई से ज्यादा जवाबदेही जरूरी
शहरवासियों का कहना है कि केवल नोटिस जारी करने या कुछ भवन सील करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। यह भी जांच होनी चाहिए कि जिन अवैध बेसमेंटों पर आज कार्रवाई हो रही है, उन्हें निर्माण की अनुमति किसने दी थी और वर्षों तक उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
लखनऊ और दिल्ली जैसे दर्दनाक हादसों ने एक बार फिर चेतावनी दी है कि यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए तो कानपुर भी किसी बड़े हादसे का गवाह बन सकता है। अब निगाहें योगी सरकार और प्रशासन पर हैं कि क्या इस बार कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी या फिर अवैध निर्माण और भ्रष्टाचार के इस पूरे नेटवर्क पर वास्तव में शिकंजा कसा जाएगा।
जब तक मौत के इन तहखानों पर स्थायी कार्रवाई नहीं होती, तब तक शहर के हजारों छात्र, मरीज, व्यापारी और आम नागरिक रोज अपनी जान जोखिम में डालकर इन इमारतों में आने-जाने को मजबूर रहेंगे।