पूर्व सांसद प्रमोद कुरील ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से किया हस्तक्षेप का अनुरोध
कानपुर-देश की आर्थिक और बैंकिंग व्यवस्था की धुरी माने जाने वाले भारतीय रिजर्व बैंक में इन दिनों गहरा असंतोष और उथल-पुथल का माहौल बना हुआ है। केंद्र सरकार द्वारा पदोन्नति (प्रमोशन) संबंधी नियमों में किए गए बदलावों के विरोध में आरबीआई के हजारों अधिकारी अब खुलकर आंदोलन के रास्ते पर उतर आए हैं। अधिकारियों का आरोप है कि नए प्रमोशन नियम न केवल मनमाने हैं, बल्कि इससे कर्मचारियों की सेवा प्रगति, वरिष्ठता और भविष्य की संभावनाओं पर गंभीर असर पड़ेगा।
बताया जा रहा है कि इस आंदोलन में सामान्य वर्ग के साथ-साथ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़े अधिकारी भी बड़ी संख्या में शामिल हैं। लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाने के बावजूद जब सरकार और संबंधित विभागों की ओर से कोई ठोस पहल नहीं हुई, तो अधिकारियों ने 15 मई 2026 से चरणबद्ध “क्रमिक आंदोलन” शुरू करने का ऐलान कर दिया।
आंदोलन के पहले चरण में अधिकारियों ने विरोध दर्ज कराते हुए खुद को विभागीय और आधिकारिक व्हाट्सऐप ग्रुपों से अलग कर लिया है। इसके साथ ही 29 मई को प्रस्तावित सामूहिक आकस्मिक अवकाश (कैजुअल लीव) के लिए आवेदन भी विभागों में जमा कराए गए हैं। अधिकारी इन दिनों छाती पर विरोध स्वरूप बिल्ले लगाकर “वर्क टू रूल” के तहत कार्य कर रहे हैं, यानी केवल निर्धारित नियमों और समय सीमा के भीतर ही कार्य किया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, आंदोलन के दौरान लंच टाइम में शांतिपूर्ण प्रदर्शन, सामूहिक विरोध सभाएं और अधिकारियों द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा को ज्ञापन सौंपने की भी तैयारी की गई है। आंदोलन के अगले चरण में अधिकारी काले कपड़े पहनकर अथवा काली पट्टी बांधकर “गो-स्लो” नीति के तहत काम करेंगे, जिससे बैंकिंग संचालन की रफ्तार प्रभावित होने की संभावना जताई जा रही है।
अधिकारियों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया, तो 29 मई को देशभर के हजारों अधिकारी सामूहिक आकस्मिक अवकाश पर चले जाएंगे। खास बात यह है कि 29 मई के बाद 30 और 31 मई को शनिवार और रविवार का साप्ताहिक अवकाश है। ऐसे में लगातार तीन दिनों तक आरबीआई के कामकाज पर व्यापक असर पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है।
आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि वर्तमान समय में वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, महंगाई, अंतरराष्ट्रीय तनाव और मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच यदि भारतीय रिजर्व बैंक के शीर्ष अधिकारियों का आंदोलन लंबा खिंचता है, तो इसका असर पूरे वित्तीय तंत्र पर दिखाई दे सकता है। बैंकिंग संचालन, वित्तीय निगरानी, मुद्रा प्रबंधन और नीतिगत फैसलों पर भी इसका प्रभाव पड़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
इस पूरे मामले को गंभीर बताते हुए पूर्व राज्यसभा सांसद प्रमोद कुरील ने देश के शीर्ष नेतृत्व को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण तथा आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा को विस्तृत पत्र भेजकर स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया है।
प्रमोद कुरील ने अपने पत्र में कहा है कि देश इस समय आर्थिक चुनौतियों के कठिन दौर से गुजर रहा है। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव और वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं का सीधा दबाव भारतीय मुद्रा “रुपये” पर पड़ रहा है। दूसरी ओर महंगाई की मार से गरीब और मध्यम वर्ग पहले ही परेशान है। ऐसे समय में भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका देश की अर्थव्यवस्था को संतुलित बनाए रखने में बेहद अहम हो जाती है।
उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की है कि अधिकारियों की समस्याओं और आपत्तियों को गंभीरता से सुना जाए तथा संवेदनशीलता के साथ इस विवाद का जल्द समाधान निकाला जाए, ताकि देश की बैंकिंग और आर्थिक व्यवस्था पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। प्रमोद कुरील ने चेतावनी दी कि यदि समय रहते इस मामले का समाधान नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में वित्तीय क्षेत्र में अनिश्चितता और अस्थिरता की स्थिति और अधिक गहरा सकती है।