मातृ दिवस विशेष : माँ की सीख को आत्मसात कर हजारों बेसहारों का सहारा बने मुन्ना सिंह चौहान
कानपुर। मदर्स डे (मातृ दिवस) जहां अधिकतर लोगों के लिए खुशियों, उपहारों और अपनी माँ के प्रति प्रेम व्यक्त करने का अवसर होता है, वहीं शहर के समाजसेवी मुन्ना सिंह चौहान के लिए यह दिन एक ऐसे संकल्प को याद करने का अवसर है, जिसने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी। अपनी माँ को खो देने के डर और उस दर्दनाक अनुभव ने उन्हें समाज के बेसहारा और लावारिस लोगों की सेवा के रास्ते पर खड़ा कर दिया।मुन्ना सिंह चौहान बताते हैं कि लॉकडाउन शुरू होने से ठीक दो दिन पहले उनकी 90 वर्षीय बुजुर्ग माँ, जो याददाश्त खो चुकी थीं, अचानक घर से लापता हो गईं। वह एक रात उनके पूरे परिवार के लिए किसी भयावह सपने से कम नहीं थी। माँ की तलाश में भटकते हुए उनके मन में तरह-तरह के डर घर करने लगे। समाज के ताने, अनहोनी की आशंका और सड़कों पर बेसहारा पड़े बुजुर्गों की तस्वीरें उन्हें भीतर तक झकझोर रही थीं।
उन्होंने बताया कि उस दौरान उनके मन में बार-बार यही ख्याल आ रहा था कि अगर उनकी माँ भी कहीं लावारिस हालत में मिलें तो क्या होगा। कूड़े के ढेर के पास पड़े बुजुर्गों और सड़कों पर दम तोड़ती लावारिस जिंदगियों के दृश्य उन्हें विचलित कर रहे थे। हालांकि माँ काली की कृपा से उनकी माँ सुरक्षित मिल गईं, लेकिन उस घटना ने उनके मन में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया—“उन लोगों का क्या, जो अपनों से बिछड़कर सड़कों पर बेसहारा पड़े रहते हैं।इसी सवाल और भीतर उठे दर्द ने ‘लावारिस सेवा सुश्रुषा मिशन’ की नींव रखी। इसके बाद मुन्ना सिंह चौहान ने अपना जीवन लावारिस, बेसहारा और जरूरतमंद लोगों की सेवा को समर्पित कर दिया। आज भले ही उनकी माँ इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी दी हुई सीख और संस्कार हर दिन उनके कार्यों में जीवित दिखाई देते हैं।
मुन्ना सिंह चौहान कहते हैं कि जब वे सड़क किनारे मिले किसी बेसहारा बुजुर्ग की मदद करते हैं, किसी भूखे को खाना खिलाते हैं या किसी असहाय माँ के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें ऐसा महसूस होता है जैसे उनकी अपनी माँ उनके साथ खड़ी हैं।
वे बताते हैं कि सीमित संसाधनों और पारिवारिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने कभी सेवा का रास्ता नहीं छोड़ा। उनके लिए निस्वार्थ मानव सेवा ही सबसे बड़ा धर्म और माँ को सच्ची श्रद्धांजलि है। उनका मानना है कि केवल मातृ दिवस पर तस्वीरें साझा कर देना ही माँ का सम्मान नहीं है, बल्कि उनके संस्कारों को जीवन में उतारना ही वास्तविक सम्मान है।