मासूम सोनी की मौत, भाई शिवम का साहस देख रो पड़ा अस्पताल

कानपुर। नियति जब क्रूर होती है तो वह मासूम चेहरों पर भी रहम नहीं करती। प्रतापगढ़ की रहने वाली मासूम सोनी जायसवाल की जिंदगी बचाने की जंग गुरुवार को कानपुर के हृदय रोग संस्थान (कार्डियोलॉजी) में खत्म हो गई। लेकिन इस दर्दनाक कहानी के बीच एक ऐसे नन्हे बेटे का साहस सामने आया, जिसने वहां मौजूद डॉक्टरों, कर्मचारियों और तीमारदारों की आंखें नम कर दीं। सोनी की मौत के बाद हर किसी की जुबान पर सिर्फ एक ही नाम था—शिवम। छोटी उम्र में ही जिंदगी की सबसे बड़ी जिम्मेदारियों का बोझ उठाने वाला यह मासूम अपनी लकवाग्रस्त मां और बीमार बहन के लिए किसी सहारे से कम नहीं था। पिता का साया पहले ही सिर से उठ चुका था। ऐसे में शिवम ने अपनी उम्र से कहीं ज्यादा बड़ा साहस दिखाते हुए मां को संभाला और बहन के इलाज के लिए प्रतापगढ़ से प्रयागराज होते हुए कानपुर तक संघर्ष भरा सफर तय किया।
डॉक्टरों के अनुसार सोनी के दिल में करीब चार सेंटीमीटर का बड़ा छेद था। इसके साथ ही उसकी छाती में गंभीर संक्रमण फैल चुका था। कार्डियोलॉजी के चिकित्सकों ने बच्ची को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया। इलाज के दौरान डॉक्टरों की टीम लगातार निगरानी कर रही थी, लेकिन हालत लगातार बिगड़ती चली गई और अंततः मासूम जिंदगी मौत से जंग हार गई।
अस्पताल का माहौल उस समय बेहद भावुक हो गया जब सोनी के मृत्यु प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए उसका छोटा भाई शिवम आगे आया। कांपते हाथ, आंखों से बहते आंसू और होंठ दबाकर खुद को संभालने की उसकी कोशिश ने वहां मौजूद हर व्यक्ति का दिल दहला दिया। अनुभवी डॉक्टर और अस्पताल कर्मचारी भी इस दृश्य को देखकर अपने आंसू नहीं रोक सके।
बताया जाता है कि इलाज के दौरान शिवम हर पल अपनी बहन के साथ मौजूद रहा। कभी मां को संभालता, कभी डॉक्टरों से जानकारी लेता और कभी बहन के सिरहाने बैठकर उसे दिलासा देता। उसकी मासूम आंखों में अपनी बहन को बचा लेने की उम्मीद आखिरी समय तक दिखाई देती रही।
इस कठिन घड़ी में सामाजिक संस्था देवदूत वानर सेना भी परिवार के साथ मजबूती से खड़ी रही। संस्था के सदस्यों ने “जिंदगी के साथ भी, जिंदगी के बाद भी” के संकल्प को निभाते हुए परिवार को हर संभव सहयोग दिया। परिवार की आर्थिक और मानसिक स्थिति को देखते हुए संस्था ने तय किया कि नन्हे शिवम को इस हालत में अकेले प्रतापगढ़ नहीं भेजा जाएगा।
वानर सेना के सदस्य मृतका के पार्थिव शरीर और शोकाकुल परिवार के साथ अंतिम सफर तक मौजूद रहे। संस्था के सदस्यों ने कहा कि शिवम ने जिस तरह अपनी लकवाग्रस्त मां और बीमार बहन को संभाला, वह उसकी उम्र से कहीं बड़ा साहस है। समाज को ऐसे कठिन समय में इस परिवार के साथ खड़ा होना चाहिए।
आज प्रतापगढ़ से लेकर कानपुर तक हर आंख नम है। लोग मासूम सोनी की मौत पर दुख व्यक्त कर रहे हैं और नन्हे शिवम के साहस को सलाम कर रहे हैं। हर कोई ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है कि मासूम सोनी की आत्मा को शांति मिले और छोटे शिवम को इस अपार दुख को सहने की शक्ति प्राप्त हो।

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