कानपुर। शहर के निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। भार्गव हॉस्पिटल में इलाज के दौरान एक महिला की मौत के बाद मचा बवाल अब सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर गंभीर आरोप बनकर उभरा है। परिजनों का कहना है कि यह मौत बीमारी से नहीं, बल्कि लापरवाही से हुई है—और यही आरोप शहर के कई अस्पतालों पर पहले भी लगते रहे हैं। घटना के अनुसार, महिला को सांस लेने में दिक्कत होने पर परिजन उसे आनन-फानन में अस्पताल लेकर पहुंचे थे। हालत गंभीर बताकर आईसीयू में भर्ती तो कर लिया गया, लेकिन आरोप है कि इलाज से ज्यादा ध्यान बिल बनाने पर दिया गया। महंगी दवाइयां मंगवाई गईं, लेकिन मरीज की हालत लगातार बिगड़ती गई। सबसे चौंकाने वाला आरोप यह है कि रात के समय जब महिला जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही थी, तब ड्यूटी पर तैनात स्टाफ सोता मिला। परिजनों को पूरी रात आईसीयू में जाने से रोका गया। सुबह जब वे जबरन अंदर पहुंचे, तो मरीज की हालत बेहद गंभीर थी और उसकी पल्स गिर चुकी थी। हंगामा करने के बाद ही अस्पताल प्रशासन सक्रिय हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। आरोप यह भी है कि हालत बिगड़ने पर अस्पताल ने जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए महिला को दूसरे अस्पताल रेफर करने की बात कह दी। परिजनों का कहना है कि अगर समय पर सही इलाज मिलता, तो जान बच सकती थी।
घटना के बाद अस्पताल परिसर में जमकर हंगामा हुआ। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर स्थिति को संभाला और जांच का आश्वासन दिया। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर बार की तरह इस बार भी मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
पुराने मामलों ने खोली सिस्टम की हकीकत
यह कोई पहला मामला नहीं है जब कानपुर में अस्पतालों की लापरवाही सामने आई हो। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जिन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है—
कुछ समय पहले एक निजी अस्पताल में डेंगू से पीड़ित युवक की मौत के बाद परिजनों ने आरोप लगाया था कि प्लेटलेट्स की व्यवस्था समय पर नहीं की गई, जबकि बिल लाखों में बना दिया गया।
एक अन्य मामले में प्रसूता की मौत पर परिवार ने डॉक्टरों पर गलत इंजेक्शन देने का आरोप लगाया था, जिसके बाद अस्पताल में जमकर हंगामा हुआ।
कोविड काल के दौरान भी कई शिकायतें सामने आई थीं, जहां मरीजों से मोटी रकम वसूलने के बावजूद पर्याप्त इलाज नहीं मिला और कई लोगों ने दम तोड़ दिया।
हाल ही में एक बच्चे की मौत के मामले में भी परिजनों ने आरोप लगाया था कि डॉक्टर समय पर उपलब्ध नहीं थे और स्टाफ ने लापरवाही बरती।
इन सभी मामलों में शुरुआत में जोरदार विरोध हुआ, मीडिया में खबरें छपीं, स्वास्थ्य विभाग हरकत में आया, छापेमारी हुई—लेकिन कुछ ही दिनों में सब कुछ सामान्य हो गया।
छापेमारी के बाद ‘सेटिंग’ का खेल?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई केवल दिखावा बनकर रह गई है। जब मामला सुर्खियों में आता है, तो कुछ दिन सख्ती दिखाई जाती है, लेकिन बाद में फाइलें दफ्तरों में दब जाती हैं।
यह भी आरोप लगते रहे हैं कि कई अस्पतालों पर कार्रवाई के बजाय ‘समझौता’ कर लिया जाता है। कुछ अस्पतालों का नाम बदलकर दोबारा संचालन शुरू कर दिया जाता है और वही लापरवाही का सिलसिला फिर शुरू हो जाता है।
जवाबदेही का अभाव बना सबसे बड़ा संकट
विशेषज्ञों का मानना है कि निजी अस्पतालों में निगरानी की कमी और जवाबदेही तय न होने के कारण ऐसे मामले बढ़ते जा रहे हैं। मरीज और उनके परिजन मजबूरी में महंगे अस्पतालों का रुख करते हैं, लेकिन उन्हें न तो पारदर्शिता मिलती है और न ही भरोसेमंद इलाज।
सवाल जो हर किसी के मन में हैं
क्या कानपुर में इलाज अब सुरक्षित नहीं रहा?
क्या मरीजों की जिंदगी से ज्यादा अहमियत पैसे को दी जा रही है?
स्वास्थ्य विभाग कब तक केवल कागजी कार्रवाई करता रहेगा?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या किसी की मौत के बाद ही सिस्टम जागेगा?
फिलहाल, भार्गव हॉस्पिटल का मामला जांच के दायरे में है। परिजन न्याय की मांग कर रहे हैं, लेकिन शहरवासियों को इंतजार है उस दिन का जब लापरवाही पर सिर्फ हंगामा नहीं, बल्कि ठोस और स्थायी कार्रवाई होगी।