कानपुर। देशभर के बैंककर्मियों ने अपनी लंबे समय से लंबित और बहुप्रतीक्षित मांग ‘5-डे बैंकिंग’ को लागू कराने के लिए सोमवार को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अभूतपूर्व शक्ति प्रदर्शन किया। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन (UFBU) के आह्वान पर आयोजित इस ‘डिजिटल मोबलाइजेशन’ अभियान ने सोशल मीडिया पर सरकार के लिए स्पष्ट संदेश दे दिया कि बैंककर्मी अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होने वाले हैं।
इस राष्ट्रव्यापी डिजिटल आंदोलन के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर #Implement5DayBanking हैशटैग के साथ 5 लाख 16 हजार से अधिक ट्वीट्स किए गए, जिससे यह हैशटैग दिनभर नेशनल ट्रेंड में शीर्ष स्थान पर बना रहा। बैंककर्मियों के साथ-साथ आम जनता, सामाजिक संगठनों और कर्मचारी संघों ने भी इस अभियान को समर्थन दिया, जिससे यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सका।
बैंककर्मियों में बढ़ता असंतोष, सरकार पर अनदेखी का आरोप
यूपी बैंक एम्पलाइज यूनियन के मंत्री रजनीश गुप्ता और संयुक्त मंत्री अंकुर द्विवेदी ने संयुक्त बयान जारी करते हुए कहा कि भारतीय बैंक संघ (IBA) द्वारा 5-दिवसीय बैंकिंग की संस्तुति काफी समय पहले केंद्र सरकार को भेजी जा चुकी है, लेकिन अब तक उस पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की यह अनदेखी बैंककर्मियों में भारी असंतोष और निराशा को जन्म दे रही है।
उन्होंने कहा कि लगातार बढ़ते कार्यभार, स्टाफ की कमी और लंबी कार्य अवधि के कारण बैंककर्मी मानसिक और शारीरिक दबाव में काम कर रहे हैं। ऐसे में 5-दिवसीय कार्य सप्ताह न केवल कर्मचारियों की सेहत के लिए जरूरी है, बल्कि बैंकिंग सेवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य हो गया है।
डिजिटल युग में बदली बैंकिंग की तस्वीर
यूनियन पदाधिकारियों ने तर्क दिया कि आज बैंकिंग व्यवस्था पूरी तरह डिजिटल हो चुकी है। एटीएम, यूपीआई, मोबाइल बैंकिंग और इंटरनेट बैंकिंग जैसी सेवाएं 24 घंटे, सातों दिन उपलब्ध हैं। ऐसे में सप्ताह में दो दिन बैंक बंद रहने से आम जनता को किसी प्रकार की असुविधा नहीं होती।
रजनीश गुप्ता ने कहा, “आज ग्राहक शाखा पर कम और डिजिटल माध्यमों पर अधिक निर्भर हैं। इसके बावजूद बैंककर्मियों पर काम का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। 5-डे बैंकिंग लागू होने से कर्मचारी अधिक तरोताजा रहेंगे और ग्राहकों को बेहतर सेवा दे पाएंगे।”
अन्य क्षेत्रों से तुलना, भेदभाव का आरोप
पंजाब नेशनल बैंक स्टाफ एसोसिएशन के चेयरमैन अनिल सोनकर ने इस मुद्दे पर सरकार से सीधा सवाल किया। उन्होंने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक, बीमा क्षेत्र, केंद्र सरकार के मंत्रालयों और अनेक सार्वजनिक संस्थानों में 5-दिवसीय कार्य सप्ताह वर्षों से सफलतापूर्वक लागू है, तो फिर सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंकों के साथ यह भेदभाव क्यों किया जा रहा है?
उन्होंने कहा कि बैंककर्मी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और वित्तीय समावेशन से लेकर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन तक में अहम भूमिका निभाते हैं, फिर भी उनकी जायज मांगों को नजरअंदाज किया जा रहा है।
कानपुर में दिखा व्यापक समर्थन
कानपुर में भी बैंककर्मियों ने इस डिजिटल आंदोलन में पूरे उत्साह के साथ भाग लिया। शहर की सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की अधिकांश बैंक शाखाओं के कर्मचारियों ने सोशल मीडिया के माध्यम से अभियान को समर्थन दिया। पदाधिकारियों के अनुसार, कानपुर के सैकड़ों बैंककर्मियों ने व्यक्तिगत और संगठनात्मक अकाउंट से ट्वीट कर सरकार को स्पष्ट संदेश दिया कि अब निर्णायक कदम जरूरी है।
इसके साथ ही कई ग्राहकों और सामाजिक संगठनों ने भी बैंककर्मियों के समर्थन में अपनी बात रखी और 5-डे बैंकिंग को समय की जरूरत बताया।
आंदोलन का भविष्य और चेतावनी
यूनियन नेताओं ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि यदि इस डिजिटल शक्ति प्रदर्शन के बाद भी सरकार ने 5-डे बैंकिंग को लेकर ठोस और सकारात्मक निर्णय नहीं लिया, तो आने वाले दिनों में बैंककर्मी सड़कों पर उतरकर भौतिक प्रदर्शन, धरना और राष्ट्रव्यापी हड़ताल जैसे कदम उठाने को मजबूर होंगे।
उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल कर्मचारियों के अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि बेहतर बैंकिंग सेवाएं, संतुलित कार्य संस्कृति और स्वस्थ कार्य वातावरण बनाने की लड़ाई भी है।
निष्कर्ष
यह डिजिटल आंदोलन इस बात का संकेत है कि बैंककर्मी अब पारंपरिक आंदोलनों से आगे बढ़कर आधुनिक माध्यमों से अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। 5-डे बैंकिंग की मांग अब केवल कर्मचारी संगठनों की मांग नहीं रह गई है, बल्कि यह कार्य-संस्कृति में सुधार और डिजिटल भारत की दिशा में एक स्वाभाविक कदम के रूप में देखी जा रही है। आने वाले दिनों में सरकार इस पर क्या निर्णय लेती है, यह पूरे बैंकिंग सेक्टर और देश की वित्तीय व्यवस्था के लिए बेहद अहम होगा।
बैंककर्मियों ने डिजिटल मोर्चा खोला, 5-दिवसीय कार्य सप्ताह लागू करने की मांग तेज