कानपुर। मानवता, करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व की अनुपम मिसाल पेश करते हुए समाज कल्याण सेवा समिति द्वारा विगत 17 वर्षों से संचालित ‘कंधा दान अभियान’ के प्रथम दिन एक अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला। हिंदू समुदाय के सैकड़ों लोगों ने लावारिस शवों का वारिस बनकर पोस्टमार्टम हाउस से कंधों पर शव यात्रा निकाली, जिस पर सड़क पर चलते-चलते फूलों की बेतहाशा वर्षा होने लगी।
समिति द्वारा अब तक लगभग 1,67,000 लावारिस शवों तथा कोरोना काल के दौरान 2750 कोविड संक्रमित शवों का पूरे विधि-विधान और सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कराया जा चुका है। यह आंकड़ा अपने आप में समिति की निस्वार्थ सेवा और समर्पण का जीवंत प्रमाण है।
पोस्टमार्टम हाउस से जैसे ही शव यात्रा सड़क पर निकली, मानो पूरा वातावरण थम सा गया। राह चलते लोगों के कदम रुक गए और हर किसी के मुख से यही शब्द निकले—
“भैया, यह किस महान व्यक्ति का शव है, जिसकी शव यात्रा में कंधा देने वालों की होड़ लगी है?”
जब लोगों को यह ज्ञात हुआ कि यह शव किसी लावारिस का है, तो अनेक राहगीर भावुक हो उठे और इस कार्य को “इंसानियत का फर्ज” बताते हुए समिति की भूरी-भूरी प्रशंसा करने लगे। कई लोग स्वतः ही इस महामानव सेवा यज्ञ में कंधा देने के लिए आगे आ गए।
कंधा दान अभियान में शामिल लोगों को संबोधित करते हुए समिति के सचिव पैंथर धनीराम बौद्ध ने कहा,
“न कोई लावारिश पैदा हुआ, न कोई लावारिश मरेगा। हमारी समिति और इंसानियत पसंद लोग आजीवन लावारिसों के वारिस बने रहेंगे।”
उन्होंने समिति का संदेश दोहराते हुए कहा—
“इंसान से इंसान का हो भाईचारा, यही संदेश हमारा।”
धनीराम बौद्ध ने बताया कि यह मुहिम फिलहाल कानपुर नगर एवं देहात में संचालित की जा रही है और भविष्य में इसे पूरे प्रदेश में विस्तार देने की मंशा है, हालांकि आर्थिक तंगी इस कार्य में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। उन्होंने जनमानस से तन, मन और धन से सहयोग करने की अपील की। यदि आर्थिक सहयोग संभव न हो, तो बांस, पन्नी, कफन, चादर दान करने या कम से कम कंधा दान देकर इस पुण्य कार्य में सहभागी बनने का आह्वान किया।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई और कुछ न कर सके, तो इस मुहिम में लगे जांबाज कर्मियों को गोद लेकर उनका मनोबल बढ़ाए, जिससे यह सेवा निरंतर चलती रहे।
वहीं समिति की महिला अध्यक्ष सुनीता बौद्ध ने अपने संबोधन में कहा कि इंसान को जाति, धर्म और वर्ग से ऊपर उठकर हर इंसान के काम आना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस तरह का जोखिम भरा और संवेदनशील कार्य कानपुर में किसी अन्य संस्था ने करने का साहस नहीं किया।
सुनीता बौद्ध ने कहा,
“हमारी समिति लावारिसों को अपना भाई-बहन और माता-पिता मानकर उन्हें अपनत्व और सम्मान देती है। यह मानवता की सच्ची मिसाल है।”
उन्होंने सभी समाजसेवियों और नागरिकों से समिति के कारवां को आगे बढ़ाने के लिए निरंतर सहयोग की नितांत आवश्यकता जताई।
कंधा दान अभियान बना इंसानियत की मिसाल, लावारिसों के बने सैकड़ों वारिस