निःसंतानता उपचार में जीएसवीएम को सफलता

कानपुर।
निःसंतानता के दर्द से वर्षों से जूझ रही महिलाओं के लिए जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज, कानपुर के जच्चा-बच्चा अस्पताल से एक उम्मीद भरी खबर सामने आई है। अस्पताल के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग में अत्याधुनिक ओवेरियन पीआरपी (प्लेटलेट रिच प्लाज्मा) तकनीक की शुरुआत की गई है, जिससे उन महिलाओं को मां बनने का अवसर मिल सकता है, जिन्हें लंबे समय से संतान सुख प्राप्त नहीं हो पा रहा था। इस तकनीक से विभाग को प्रारंभिक सफलता भी मिली है, जहां 15 वर्षों से निःसंतान एक महिला ने स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया है।
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के जच्चा-बच्चा अस्पताल में प्रतिदिन बड़ी संख्या में ऐसी महिलाएं उपचार के लिए पहुंचती हैं, जो वर्षों तक इलाज कराने के बावजूद गर्भधारण नहीं कर पातीं। ऐसी ही महिलाओं के लिए विभाग द्वारा ओवेरियन पीआरपी उपचार को एक नई पहल के रूप में शुरू किया गया है। इस उपचार की अगुवाई कर रहीं डॉ. उरूज जहाँ ने बताया कि यह तकनीक विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए लाभकारी है, जिनका ओवेरियन रिज़र्व कम हो चुका है या जिनकी उम्र बढ़ने के साथ अंडों की गुणवत्ता प्रभावित हो गई है।
डॉ. उरूज जहाँ के अनुसार, ओपीडी में आई तीन निःसंतान महिलाओं को जांच के बाद ओवेरियन पीआरपी के लिए चिन्हित किया गया था। इन महिलाओं को पिछले 10 से 15 वर्षों से संतान सुख प्राप्त नहीं हो रहा था। इनमें से लाल बंगला क्षेत्र की 40 वर्षीय महिला, जो लगभग 15 वर्षों से निःसंतानता से पीड़ित थी, को पीआरपी उपचार के साथ आईयूआई प्रक्रिया भी कराई गई। उपचार के बाद महिला सफलतापूर्वक गर्भवती हुई और उसने एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया। प्रसव के बाद जच्चा और बच्चा दोनों पूरी तरह स्वस्थ हैं तथा उनका नियमित फॉलोअप किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि उपचार के दौरान दो अन्य महिलाओं में गर्भधारण तो हुआ, लेकिन कुछ चिकित्सकीय कारणों से गर्भपात हो गया। डॉक्टरों का कहना है कि इन मामलों का भी गहन अध्ययन किया जा रहा है और भविष्य में दोबारा उपचार की योजना बनाई जाएगी। विभाग का उद्देश्य है कि निःसंतानता से पीड़ित इच्छुक महिलाओं को उचित जांच के बाद यह सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
क्या है ओवेरियन पीआरपी तकनीक
डॉ. उरूज जहाँ ने विस्तार से बताया कि ओवेरियन पीआरपी एक आधुनिक प्रजनन उपचार पद्धति है, जिसमें महिला के स्वयं के रक्त का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में महिला के हाथ से थोड़ी मात्रा में रक्त लिया जाता है, जिसे विशेष सेंट्रीफ्यूज मशीन में घुमाया जाता है। इस प्रक्रिया से रक्त के विभिन्न घटक अलग-अलग हो जाते हैं और प्लेटलेट-समृद्ध प्लाज्मा तैयार किया जाता है।
तैयार किए गए इस पीआरपी को अल्ट्रासाउंड के मार्गदर्शन में इंजेक्शन के माध्यम से सीधे अंडाशय में प्रविष्ट कराया जाता है। पीआरपी में मौजूद ग्रोथ फैक्टर निष्क्रिय पड़ी स्टेम कोशिकाओं और फॉलिकल्स को सक्रिय करने का कार्य करते हैं। इससे अंडों की गुणवत्ता और संख्या में सुधार होता है, अंडाशय में रक्त प्रवाह बेहतर होता है और कमजोर ओवरी में नई सक्रियता आती है।
डॉक्टरों के अनुसार, इस उपचार से एंटी-म्यूलरियन हार्मोन (AMH) के स्तर में भी सुधार देखा जा सकता है, जो महिला की प्रजनन क्षमता का एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। यही कारण है कि यह तकनीक उन महिलाओं के लिए विशेष रूप से लाभकारी साबित हो सकती है, जिनमें पारंपरिक उपचारों से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाए हैं।
निःसंतान महिलाओं के लिए नई उम्मीद
विभाग का मानना है कि ओवेरियन पीआरपी तकनीक भविष्य में निःसंतानता के उपचार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकती है। हालांकि डॉक्टर यह भी स्पष्ट करते हैं कि हर महिला में परिणाम एक समान हों, यह आवश्यक नहीं है और उपचार से पहले संपूर्ण चिकित्सकीय जांच अत्यंत आवश्यक है।
इस महत्वपूर्ण पहल में विभागाध्यक्ष डॉ. रेनू गुप्ता, डॉ. नीना गुप्ता, डॉ. पाविका लाल, डॉ. रश्मि यादव सहित पूरे मेडिकल एवं नर्सिंग स्टाफ का उल्लेखनीय सहयोग रहा। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज द्वारा शुरू की गई यह सुविधा न केवल कानपुर, बल्कि आसपास के जिलों से आने वाली निःसंतान महिलाओं के लिए भी एक नई आशा की किरण बनकर सामने आई है।

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