छावनी परिषद में अलाव बना ‘लिस्ट–राज’, ठिठुरती गरीब जनता बेहाल
मनीष गुप्ता
कानपुर। कड़ाके की ठंड और सर्द बर्फीली हवाओं के बीच जहां आम जनता अलाव की आस लगाए बैठी है, वहीं छावनी परिषद क्षेत्र में अलाव जलना भी अब “चेयरमैन की मर्जी” पर निर्भर हो गया है। हालात इतने बदतर हैं कि फुटपाथ पर रात गुजारने वाले गरीब, मजदूर और राहगीर ठंड से कांप रहे हैं, लेकिन जिम्मेदारों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।स्थानीय कर्मचारियों से जब अलाव न जलने को लेकर सवाल किया गया तो जवाब और भी चौंकाने वाला निकला। कर्मचारियों ने साफ कहा— “चेयरमैन जहां बताएंगे, वहीं लकड़ी गिरेगी।” यानी ठंड से बचने के लिए अब गरीबों को भी चेयरमैन के घर और दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं।सूत्रों के मुताबिक, छावनी परिषद में अलाव जलाने के लिए बाकायदा “लिस्ट सिस्टम” लागू है। कर्मचारी खुलेआम कहते नजर आ रहे हैं कि “जब तक नाम लिस्ट में नहीं होगा, तब तक लकड़ी नहीं डाली जाएगी।” सवाल यह है कि सड़क किनारे ठिठुरते बेसहारा लोग आखिर किस लिस्ट में अपना नाम दर्ज कराएं।हैरानी की बात यह है कि शहर के अन्य हिस्सों में सरकार के निर्देश पर चौराहा–चौराहा अलाव जलाए जा रहे हैं, लेकिन छावनी परिषद का “अलग ही फंडा” नजर आ रहा है। यहां न इंसानियत दिख रही है, न संवेदनशीलता—सिर्फ आदेश और इशारों की राजनीति। स्थानीय लोगों का कहना है कि ठंड जानलेवा होती जा रही है, लेकिन छावनी परिषद की व्यवस्था गरीबों के लिए मजाक बनकर रह गई है। राहगीर, रिक्शा चालक, मजदूर और फुटपाथ पर रहने वाले लोग रातभर अलाव की तलाश में भटकते नजर आते हैं, पर उन्हें सिर्फ निराशा ही हाथ लगती है।
अब सवाल उठ रहा है कि क्या ठंड से बचने का हक भी सिफारिश और लिस्ट का मोहताज हो गया है? क्या छावनी परिषद ठिठुरती जनता की जिम्मेदारी लेने को तैयार है, या फिर चेयरमैन के इशारे का इंतजार यूं ही चलता रहेगा।
कैन्टबोर्ड चेयरमैन के इशारे पर ही जलेगी आग