वसूली कांड का बड़ा धमाका: रिकॉर्ड मिटाने में जुटा पूरा नेटवर्क

कानपुर। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कथित अवैध वसूली कांड में अब रोज़ नई परतें खुल रही हैं। सूत्रों का कहना है कि शुरुआती खुलासों को हल्के में लेने वाले कई लोग अब अचानक बेहद सतर्क हो गए हैं, क्योंकि जांच की आँच उन तक भी पहुँच सकती है जो अब तक पर्दे के पीछे सुरक्षित महसूस कर रहे थे।
बताया जा रहा है कि शिकायत-पत्र में नए तथ्य जुड़ने के बाद कई लोग तेज़ी से अपने पुराने मोबाइल, चैट, व्हाट्सऐप कॉल और लेन-देन से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड को साफ़ करने में लगे हैं। आरोप है कि यह कथित सिस्टम किसी एक व्यक्ति का “निजी नेटवर्क” नहीं था, बल्कि कई स्तरों पर फैला एक पूरा खेल था—नीचे मैदानी खिलाड़ी और ऊपर संरक्षण देने वाले हाथ।
2019 में लगी प्राइवेट कर्मचारी की एंट्री… और ‘नेटवर्क’ तेजी से फैलने का दावा
आरोप है कि कोरोना काल के दौरान सहायक रूप से नियुक्त एक प्राइवेट कर्मचारी ने विभाग के भीतर गोपनीय जानकारियां और प्रभाव हासिल कर खुद को इतना मजबूत कर लिया कि वह अस्पताल, क्लिनिक और पैथोलॉजी तक के रजिस्ट्रेशन में हस्तक्षेप करने लगा।
सूत्रों का कहना है कि यह कर्मचारी एक एसीएमओ के करीबी संपर्क में आकर कई फाइलों और रजिस्ट्रेशन प्रक्रियाओं में सक्रिय रहने लगा। कंप्यूटर सेक्शन में बैठकर वह संचालकों के खिलाफ साजिशी कार्रवाई कराने तक की कोशिश करता था, ऐसा आरोप है।

सबसे बड़ा दावा यह है कि वही कर्मचारी आईजीआरएस से जुड़े शिकायतों को भी संभालता था और कुछ मामलों में अस्पतालों के खिलाफ फर्जी शिकायतें बनाकर ब्लैकमेलिंग करता था। मछरिया क्षेत्र के एक अस्पताल संचालक ने इसकी शिकायत सीएमओ तक पहुंचाई थी, लेकिन आरोप है कि उसकी “ऊपर तक पकड़” के कारण कोई ठोस कदम नहीं उठ सका।

पत्नी के नाम करोड़ों की संपत्ति—सरकारी बंगले पर कब्जा—दवा कंपनी का भी नाम

सूत्रों का कहना है कि संबंधित कर्मचारी ने कुछ ही वर्षों में पत्नी के नाम कई करोड़ की संपत्तियाँ खड़ी कर लीं। एक दवा कंपनी भी उसकी पत्नी के नाम रजिस्टर्ड है, ऐसा आरोप है।
सरकारी बंगले पर कब्जे के मामले में डीएम ने बंगला खाली कराने का आदेश भी जारी किया है। विभाग के कर्मचारियों का कहना है कि वह अक्सर प्रशासनिक बैठकों में ऐसे बैठता है मानो वह कोई उच्च अधिकारी हो।

अस्पताल संचालकों का दावा: “छापे के नाम पर गाड़ी से उतरते हैं साहब… और बाद में डिमांड लिस्ट।”

अस्पताल संचालकों का आरोप है कि वह होटल-स्टाइल नंबर प्लेट लगी गाड़ी में पहुंचकर अचानक छापे जैसा माहौल बनाता है और बाद में संचालकों को अलग बुलाकर मोटी रकम की मांग करता है।
सूत्रों के मुताबिक कुछ अधिकारी उसकी पुरानी कॉल रिकॉर्डिंग और कथित निजी जानकारियों के कारण दबाव में रहते हैं, इसलिए खुले में कार्रवाई नहीं कर पाते।

संविदा कर्मी का दावा: “काम में एंट्री की फीस ही एक लाख से शुरू होती है”

सीएमओ कार्यालय में तैनात एक संविदा कर्मी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि “हर काम की शुरुआत कम से कम एक लाख रुपये से होती है। इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हुई है, लेकिन लगातार बढ़ती शिकायतों ने विभाग का माहौल गरमा दिया है।
बड़ा सवाल — क्या जांच वाकई जड़ तक पहुँचेगी।
सीएमओ ने मामले को संज्ञान में ले लिया है। प्राइवेट और संविदा कर्मचारी अपनी-अपनी सफ़ाई में जुटे हैं। कुछ लोग कानूनी सलाह लेकर पूरा प्रकरण डिप्टी सीएम तक ले जाने की तैयारी में हैं।
अब बड़ा सवाल यही है कि—
क्या यह मामला स्वास्थ्य विभाग की कथित अवैध वसूली व्यवस्था की जड़ों तक जाएगा,
या फिर कुछ दिनों बाद अन्य फाइलों की तरह धूल फाँकता रह जाएगा।
सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में यह प्रकरण विभागीय और प्रशासनिक हलकों में बड़ा सिरदर्द बन सकता है।

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