अधिकारियों की क्रूरता: क्या किसी की मौत के बाद ही जागेगा बिजली विभाग

कानपुर। 3 साल से खाली पड़े मकान के लिए भटक रही चतुर्थ श्रेणी महिला कर्मचारी; विभाग ने जर्जर मकान खाली करने का नोटिस तो दिया, पर रहने को जगह नहीं दी
कानपुर।
बिजली विभाग के आला अफसरों की संवेदनशीलता किस कदर मर चुकी है, इसकी एक रोंगटे खड़े कर देने वाली बानगी गोविन्द नगर की विद्युत कॉलोनी में देखने को मिल रही है। विभाग के ही बड़े साहबों की लापरवाही के कारण एक गरीब महिला चपरासी का परिवार मौत के साए में जीने को मजबूर है। जर्जर सरकारी आवास कभी भी गिर सकता है, विभाग ने नोटिस चिपकाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है, लेकिन बगल में ही खाली पड़े सुरक्षित मकान को आवंटित करने के नाम पर पिछले 3 साल से सिर्फ फाइलें दौड़ाई जा रही हैं। बेटी की मौत के बाद ही पसीजा था अफसरों का दिल विद्युत परीक्षण खंड में चपरासी के पद पर तैनात श्रीमती राधा ने अधिकारियों के ढुलमुल रवैए पर जो आरोप लगाए हैं, वह प्रशासनिक व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा है। पीड़िता ने बताया कि वर्ष 2020 में भी ठीक इसी तरह आवास आवंटन के लिए उन्हें अफसरों के चक्कर काटने पड़े थे। विभाग की इसी टालमटोल के बीच जर्जर मकान की बदहाली के कारण उनकी मासूम बेटी की तबीयत बिगड़ी और उसकी मौत हो गई। बेहद शर्मनाक बात यह है कि जब बेटी की जान चली गई, तब जाकर अफसरों की नींद टूटी और आनन-फानन में आवास आवंटित किया गया।
क्या अधिकारी फिर किसी की जान लेना चाहते हैं।
साहबों का रवैया देखकर ऐसा लगता है कि वे इस बार भी मेरे परिवार के किसी सदस्य की मौत या किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं। क्या हमारे मरने के बाद ही खाली पड़ा आवास संख्या 2/10 हमें नसीब होगा।
श्रीमती राधा (पीड़ित महिला कर्मचारी)
मानसून सिर पर, हादसे की पूरी जिम्मेदारी अधिशासी अभियंता की होगी आगामी वर्षा ऋतु को देखते हुए पीड़ित परिवार की रातें आंखों में कट रही हैं। जर्जर हो चुका आवास संख्या 1/10 इस बारिश को झेल पाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। पीड़िता ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि बारिश में मकान गिरने से उनके परिवार को कोई भी जानी-माली नुकसान होता है, तो इसकी पूर्ण और सीधी जिम्मेदारी अधिशासी अभियंता, विद्युत जानपद खंड (वि), कानपुर की होगी।
सवालों के घेरे में ‘साहब’: जब मकान खाली है, तो आवंटन में अड़ंगा क्यों। अखबार बिजली विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से सीधे सवाल करता है। जब कॉलोनी में आवास संख्या 2/10 खाली पड़ा है, तो एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को तीन साल से क्यों दौड़ाया जा रहा है।जर्जर मकान खाली करने का नोटिस देने वाले अफसर यह क्यों नहीं बताते कि वह गरीब परिवार अपने बच्चों को लेकर सड़क पर कहां जाए। क्या विभाग में पैरवी और रसूख के बिना एक कर्मचारी को उसका हक नहीं मिल सकता।
अब देखना यह है कि जागरण की इस ध्यानाकर्षण रिपोर्ट के बाद बिजली विभाग के मुख्य अभियंता इस मामले में हस्तक्षेप करते हैं या गोविन्द नगर विद्युत कॉलोनी में किसी बड़े हादसे की स्क्रिप्ट लिखे जाने का इंतजार करते हैं।

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