मनीष गुप्ता
कानपुर।
जब ज़्यादातर लोग अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे होते हैं, तब रेलवे स्टेशनों पर कुछ आँखें सिर्फ़ भीड़ नहीं, बल्कि खोए हुए चेहरे, डरी हुई निगाहें और मदद की उम्मीद तलाश रही होती हैं। ये आँखें हैं—जीआरपी पुलिस की। कभी परिजनों से बिछड़ा मासूम, कभी गुमशुदा बुज़ुर्ग, तो कभी संकट में फंसी महिला—जीआरपी पुलिस रोज़ाना बिना शोर किए ऐसे कई परिवारों की खुशियाँ लौटा रही है। ऑपरेशन मुस्कान जैसे अभियानों के ज़रिये नाबालिगों को सुरक्षित उनके घर पहुँचाना अब जीआरपी की पहचान बन चुका है।
माघ मेला हो या त्योहारी भीड़, प्लेटफॉर्म हो या ट्रेन—जहाँ आम लोग जल्दबाज़ी में आगे बढ़ जाते हैं, वहीं जीआरपी की सतर्क निगाहें रुककर हालात पढ़ती हैं। पूछताछ, समझदारी और संवेदनशीलता से वे उन लोगों तक पहुँचते हैं, जिन्हें सबसे ज़्यादा सहारे की ज़रूरत होती है। परिजनों की आँखों से छलकते आँसू और चेहरे पर लौटती मुस्कान—यही जीआरपी पुलिस की सबसे बड़ी टीआरपी है। बिना किसी दिखावे के, बिना किसी प्रचार के, रोज़ाना किया जाने वाला यही सराहनीय कार्य जीआरपी पुलिस को जनता के दिलों में खास जगह दिला रहा है।
कहना गलत नहीं होगा।जीआरपी पुलिस सिर्फ़ कानून नहीं संभालती, भरोसा भी संभालती है।