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कानपुर नगर: कृषि क्षेत्र में नवाचार और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए “फर्मेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर परियोजना” की शुरुआत की गई। इस संबंध में आईसीएआर-अटारी, कानपुर और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में अटारी, कानपुर के सभागार में एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आए वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों ने भाग लिया।
परियोजना का उद्देश्य और महत्व
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए अटारी के निदेशक डॉ. राघवेंद्र सिंह ने बताया कि यह परियोजना सीएसआर के तहत मारुति द्वारा वित्तपोषित है। उन्होंने कहा कि परियोजना का मुख्य उद्देश्य सी.वी.जी. (कम्प्रेस्ड बायोगैस) फैक्ट्री से उत्पन्न उप-उत्पादों को फर्मेंट कर तैयार जैविक खाद के रूप में उपयोग करना है, जिससे कृषि उत्पादन बढ़ाने, मृदा की उर्वरता में सुधार करने और पर्यावरणीय दुष्प्रभावों को कम करने में मदद मिलेगी।
22 जिलों में होगा क्रियान्वयन
डॉ. सिंह ने बताया कि उत्तर प्रदेश में इस परियोजना के प्रभावी संचालन के लिए 22 जिलों का चयन किया गया है। इन जिलों में कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से किसानों को इस नई तकनीक से जोड़ा जाएगा। उन्होंने कहा कि यह पहल देश में संतुलित उर्वरक उपयोग के राष्ट्रीय अभियान को भी मजबूती प्रदान करेगी।
पारंपरिक खाद से अधिक प्रभावी तकनीक
आईएआरआई के सस्य विज्ञान प्रभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एस.एस. राठौर ने अपने संबोधन में बताया कि फर्मेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर पारंपरिक जैविक खाद की तुलना में अधिक प्रभावशाली है। इसमें पोषक तत्वों की उपलब्धता अधिक होती है, जिससे फसलों की उत्पादकता बढ़ती है। उन्होंने कहा कि इस तकनीक को अपनाने से किसान रासायनिक उर्वरकों पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं, जिससे खेती की लागत घटेगी और दीर्घकालिक मृदा स्वास्थ्य बेहतर होगा।
किसानों तक पहुंचेगी आधुनिक तकनीक
आईएआरआई के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. राजीव कुमार सिंह ने परियोजना के क्रियान्वयन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि चयनित जिलों में कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से प्रक्षेत्र प्रदर्शन, प्रशिक्षण कार्यक्रम, किसान गोष्ठी और कृषि मेलों के जरिए इस तकनीक का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा। इससे किसानों को नई तकनीकों को समझने और अपनाने में मदद मिलेगी।
विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव
कार्यशाला में विशिष्ट अतिथि के रूप में सीएसए के निदेशक प्रसार डॉ. वी.के. त्रिपाठी और कृषि विश्वविद्यालय अयोध्या के निदेशक प्रसार डॉ. आर.बी. सिंह ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने कृषि उत्पादकता में स्थिरता लाने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रभावी कार्यान्वयन रणनीतियों पर जोर दिया।
तकनीकी सत्रों में विस्तृत प्रस्तुति
कार्यक्रम के तकनीकी सत्रों में आईएआरआई के वैज्ञानिकों द्वारा विस्तृत प्रस्तुतिकरण के माध्यम से परियोजना के विभिन्न पहलुओं पर जानकारी दी गई। इसमें फर्मेंटेड जैविक खाद के निर्माण, उपयोग, लाभ और इसके फील्ड एप्लीकेशन से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा की गई। कार्यशाला में उत्तर प्रदेश के 22 कृषि विज्ञान केंद्रों से आए वैज्ञानिकों ने सक्रिय सहभागिता की।
आभार के साथ कार्यक्रम का समापन
कार्यक्रम के अंत में आईएआरआई के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार सिंह ने सभी प्रतिभागियों और आयोजकों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह परियोजना किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी और प्रदेश में टिकाऊ कृषि को नई दिशा देगी।