मौत के सौदागर! झोलाछाप डॉक्टरों का धंधा बेखौफ जारी, मरीज बन रहे मौत का शिकार

मनीष गुप्ता

कानपुर। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि हकीकत है। शहर और देहात की गलियों में बैठे नकली डॉक्टर लोगों की जान के साथ खुलेआम खिलवाड़ कर रहे हैं। सफेद कोट पहनकर, गले में स्टेथोस्कोप डालकर और टेबल पर कुछ दवाइयाँ सजाकर ये खुद को डॉक्टर बताते हैं। असली डिग्री नहीं, लेकिन इलाज के नाम पर मौत परोसने का पूरा इंतजाम इनके पास मौजूद है।

खुलासा: 50 रुपये की पर्ची और जानलेवा इलाज

हमारी टीम जब पनकी इलाके में पहुँची तो एक किराए की दुकान पर “डॉ. शर्मा क्लीनिक” का बोर्ड टंगा मिला। पूछताछ पर पता चला कि ये “डॉक्टर” असल में इंटर पास भी नहीं है। यहाँ 50 रुपये की पर्ची पर मरीजों को तुरंत इंजेक्शन लगाया जाता है। जिन दवाइयों का इस्तेमाल हो रहा था, उनमें कई एक्सपायरी डेट की थीं।

मरीज की मौत, परिवार खामोश

बिठूर क्षेत्र के रहने वाले रामस्वरूप नामक व्यक्ति को बुखार होने पर झोलाछाप के पास ले जाया गया। गलत इंजेक्शन लगने से उसकी हालत बिगड़ी और रास्ते में ही मौत हो गई। परिवार गरीब था, शिकायत करने से डर गया। यह पहला मामला नहीं है। शहर में ऐसे न जाने कितने लोग अपनी आवाज उठाए बिना मौत के शिकार हो जाते हैं।

WHO की चेतावनी को नजरअंदाज करता सिस्टम

विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही चेतावनी दे चुका है कि भारत में हर तीन में से एक ग्रामीण “डॉक्टर” झोलाछाप होता है। कानपुर भी इससे अछूता नहीं। लेकिन अफसोस, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की उदासीनता से ये मौत के सौदागर दिन-ब-दिन और मजबूत होते जा रहे हैं।

मिलीभगत का खेल

स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई झोलाछाप डॉक्टर संरक्षण पाकर ही यह धंधा चला रहे हैं। कभी-कभार की औपचारिक छापेमारी के बाद ये कुछ दिन छिप जाते हैं और फिर नए बोर्ड और नए नाम से क्लीनिक खोलकर धंधा शुरू कर देते हैं।

गरीब जनता की मजबूरी

अस्पतालों की लंबी कतारें, महंगी जांचें और डॉक्टरों की भारी फीस गरीब जनता को मजबूर कर देती है। ऐसे में झोलाछाप 50–100 रुपये में इलाज और “तुरंत आराम” का झांसा देकर मरीजों को अपने जाल में फंसा लेते हैं। लेकिन यह राहत हमेशा अस्थायी होती है और कई बार सीधे मौत की वजह भी।

अब कब जागेगा प्रशासन?

कानपुर जैसे बड़े शहर में स्वास्थ्य व्यवस्था पर यह सवालिया निशान है कि आखिर झोलाछाप डॉक्टर कब तक बेखौफ लोगों की जिंदगी से खेलते रहेंगे। जनता की मांग है कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग मिलकर बड़े पैमाने पर कार्रवाई करे, वरना यह “सस्ती दवा और तुरंत इलाज” का झांसा लोगों की कब्रगाह बनता रहेगा।

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