कानपुर के छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग द्वारा हिंदी पत्रकारिता के गौरवमयी 200 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का रविवार को समापन हो गया। इस संगोष्ठी की शुरुआत शनिवार को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के सहयोग से हुई थी।
दो दिनों तक चले इस महासंवाद में देश-विदेश के शिक्षाविद, विषय विशेषज्ञ, शोधार्थी, विद्यार्थी और पत्रकारों ने भाग लेकर पत्रकारिता के विभिन्न आयामों पर विस्तार से चर्चा की। दूसरे दिन कार्यक्रम की शुरुआत छात्र-छात्राओं के शोध पत्र प्रस्तुतीकरण से हुई, जिसमें चार सत्र आयोजित किए गए। ऑनलाइन माध्यम से 50 से अधिक और ऑफलाइन माध्यम से 100 से अधिक स्नातक, परास्नातक व शोध छात्रों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
विमर्श सत्र में मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार दिनेश पाठक ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि पत्रकारिता हर पांच साल में बदलती है। वहीं यूक्रेन के ताराश शेव्यचेन्को कीव राष्ट्रीय विश्वविद्यालय से जुड़े प्रोफेसर यूरी ने ऑनलाइन माध्यम से बताया कि वे हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए बच्चों की पत्रिकाओं और हिंदी फिल्मों का उपयोग करते हैं।
मुख्य वक्ता बीबीएयू लखनऊ के प्रोफेसर गोविंद पाण्डेय ने हिंदी पत्रकारिता के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि कानपुर के जुगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता में हिंदी की अलख जगाई थी।
समापन सत्र में मुख्य अतिथि माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर जगदीश उपासने ने छात्रों को पेन और डायरी साथ रखने तथा अधिक से अधिक पढ़ने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि एआई से डरने की जरूरत नहीं, बल्कि इसे चुनौती के रूप में लेना चाहिए।
ऑनलाइन जुड़े भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के सदस्य सचिव डॉ. ओम उपाध्याय ने पत्रकारिता के समृद्ध इतिहास और पुराने समाचार पत्रों व पत्रिकाओं पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रोफेसर सुधीर कुमार अवस्थी ने पत्रकारों को सामाजिक सरोकार के साथ पत्रकारिता करने की नसीहत दी और सकारात्मक खबरों को प्राथमिकता देने पर जोर दिया।
इस अवसर पर प्रोफेसर राममोहन पाठक, प्रोफेसर अरुण भगत, विभागाध्यक्ष डॉ. दिवाकर अवस्थी सहित कई शिक्षक, शोधार्थी और छात्र उपस्थित रहे।