मनीष गुप्ता
कानपुर-शहर को झकझोर कर रख देने वाले सनसनीखेज ‘किडनी कांड’ ने स्वास्थ्य विभाग की कार्य-प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं इस मामले में अब तक 8 आरोपियों की गिरफ्तारी तो हो चुकी है, लेकिन इसने शहर में वर्षों से जड़ें जमाए बैठे अवैध अस्पतालों के उस विशाल नेटवर्क को उजागर कर दिया है, जो प्रशासन की नाक के नीचे बेखौफ संचालित हो रहा है आधिकारिक जानकारी के अनुसार, कानपुर नगर में लगभग 423 अस्पताल ही वैध रूप से पंजीकृत हैं वहीं, सूत्रों की मानें तो इससे कहीं अधिक संख्या में नर्सिंग होम और क्लीनिक बिना किसी मानक या वैध अनुमति के चल रहे हैं सवाल यह उठ रहा है कि वर्षों से कुर्सियों पर जमे जिम्मेदार अधिकारी इन पर प्रभावी कार्रवाई करने में क्यों नाकाम रहे? चर्चा है कि अगर विभाग रोजाना महज एक अवैध अस्पताल पर भी कार्रवाई करता, तो आज स्थिति इतनी भयावह नहीं होती, किडनी कांड के तार जिस तरह अवैध नेटवर्क से जुड़े हैं, उससे यह संदेह गहरा गया है कि क्या यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही है या फिर किसी ऊंचे स्तर पर मिलीभगत? बिना लाइसेंस के चल रहे ये संस्थान न केवल मरीजों की जान से खेल रहे हैं, बल्कि मोटी कमाई का जरिया भी बने हुए हैं आम जनता के बीच यह सवाल गूंज रहा है कि आखिर इतने लंबे समय से इन केंद्रों को किसकी ‘सरपरस्ती’ मिल रही थी?, बिना पंजीकरण के फल-फूल रहे इन अस्पतालों की रोजाना की कमाई भी अब जांच का विषय है शहर के बुद्धिजीवियों का मानना है कि यदि इन संस्थानों और विभागीय अधिकारियों के बीच कोई अवैध लेन-देन नहीं है, तो फिर ये इतने वर्षों तक बंद क्यों नहीं किए गए?अब जब पुलिस ने गिरफ्तारियां शुरू कर दी हैं, तो शहरवासियों की नजरें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं
बड़ा सवाल: क्या यह कार्रवाई केवल कुछ प्यादों की गिरफ्तारी तक सीमित रहेगी, या फिर प्रशासन उन ‘सफेदपोश’ चेहरों और पूरे हेल्थ माफिया नेटवर्क पर प्रहार करेगा जो इस गोरखधंधे की असली वजह हैं? देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन अब अवैध अस्पतालों के खिलाफ किस तरह का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करता है या मामला फिर फाइलों में दबकर रह जाता है।