मध्य पूर्व संकट से चीनी उद्योग पर असर, सल्फर महंगा

कानपुर
मध्य पूर्व एशिया में जारी युद्ध का असर अब भारत के चीनी उद्योग पर भी साफ दिखाई देने लगा है। पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति प्रभावित होने के चलते सल्फर की उपलब्धता और कीमत दोनों पर दबाव बढ़ गया है, जिससे देश के करीब 85% चीनी मिलों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
भारत में हर साल लगभग 2 लाख टन सल्फर का उपयोग होता है, जो मुख्यतः सल्फिटेशन प्रक्रिया में काम आता है। लेकिन आयात पर निर्भरता और वैश्विक आपूर्ति बाधित होने के कारण इसकी कीमतें नवंबर 2025 से लगातार बढ़ रही हैं, और युद्ध के चलते इसमें और उछाल की आशंका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति चीनी उद्योग के लिए चेतावनी है। राष्ट्रीय शर्करा संस्थान के पूर्व निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन ने सुझाव दिया है कि अब समय आ गया है कि उद्योग सल्फर-रहित चीनी उत्पादन की ओर तेजी से कदम बढ़ाए।
उन्होंने बताया कि मौजूदा सल्फिटेशन प्रक्रिया न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक है, बल्कि इससे बनी चीनी उच्च गुणवत्ता वाले उपयोग—जैसे फार्मास्युटिकल, बेवरेज और कन्फेक्शनरी उद्योग—के लिए भी उपयुक्त नहीं मानी जाती। साथ ही, इससे मशीनरी में जंग लगने और उत्पादन लागत बढ़ने जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं।
7-8 अप्रैल 2026 को नई दिल्ली में होने वाले शुगरनेक्स्ट 2026 सम्मेलन में प्रो. मोहन इस विषय पर नई तकनीकों—जैसे कार्बोनेशन, कार्बो-फॉस्फेटेशन और क्रोमैटोग्राफिक प्रक्रियाओं—पर प्रकाश डालेंगे। इन तकनीकों से सल्फर-रहित चीनी का उत्पादन समान लागत पर संभव हो सकता है।
निष्कर्ष:
मध्य पूर्व का भू-राजनीतिक संकट भारतीय चीनी उद्योग के लिए एक बड़ा संकेत है—अब पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर टिकाऊ और आधुनिक तकनीकों को अपनाने का समय आ गया है।

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