कानपुर।
उच्च न्यायालय द्वारा यथास्थिति बनाए रखने के स्पष्ट आदेश के बावजूद नगर निगम कानपुर द्वारा नए पार्किंग टेंडरों के विज्ञापन जारी किए जाने को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इस मामले को लेकर शहर के सभी पार्किंग ठेकेदारों में भारी आक्रोश व्याप्त है। ठेकेदारों ने एकजुट होकर नगर आयुक्त को शिकायती प्रार्थना-पत्र सौंपते हुए नगर निगम और स्मार्ट सिटी प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
ठेकेदारों का कहना है कि वित्तीय वर्ष 2021-2022 में नगर निगम द्वारा शहर के विभिन्न स्थानों की पार्किंग के लिए निविदाएं आमंत्रित की गई थीं, जिन्हें विधिवत स्वीकृत भी किया गया। ठेकेदारों ने निर्धारित प्रक्रिया के तहत भारी भरकम धनराशि नगर निगम में जमा की, लेकिन बाद में नगर निगम की कथित नीतिगत त्रुटियों का हवाला देते हुए इन टेंडरों को निरस्त कर दिया गया। उस समय तर्क दिया गया कि पार्किंग स्थलों पर टीन शेड, पानी और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, जबकि ठेकेदारों का दावा है कि इन सुविधाओं की व्यवस्था करना नगर निगम की जिम्मेदारी थी, न कि ठेकेदारों की।
हाईकोर्ट का आदेश, फिर भी नहीं मिली राहत
ठेकेदारों के अनुसार, टेंडर निरस्तीकरण के बाद मामला उच्च न्यायालय तक पहुंचा, जहां न्यायालय द्वारा सभी पार्किंग ठेकों के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने का स्पष्ट आदेश दिया गया। इसके बावजूद न तो ठेकेदारों को पार्किंग का संचालन करने दिया जा रहा है और न ही उनके द्वारा जमा की गई धनराशि अब तक वापस की गई है।
ठेकेदारों का आरोप है कि पिछले चार वर्षों से वे नगर निगम के चक्कर लगाने को मजबूर हैं, लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही। वित्तीय वर्ष 2021-22 में जमा की गई संपूर्ण धनराशि आज भी नगर निगम के पास जमा है, जिससे ठेकेदारों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
नए टेंडर बने आक्रोश की वजह
ठेकेदारों का कहना है कि हाईकोर्ट के यथास्थिति आदेश के बावजूद नगर निगम और स्मार्ट सिटी प्रबंधन द्वारा नए पार्किंग टेंडरों के विज्ञापन जारी करना न केवल अनुचित है, बल्कि यह न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आता है। उनका आरोप है कि एक ओर पुराने ठेकेदारों को न तो काम करने दिया जा रहा है और न ही उनकी धनराशि लौटाई जा रही है, वहीं दूसरी ओर नए टेंडर जारी कर पूरे मामले को और उलझाया जा रहा है।
या काम मिले, या पैसा लौटे
शिकायती प्रार्थना-पत्र में ठेकेदारों ने नगर आयुक्त से स्पष्ट मांग की है कि या तो उन्हें तत्काल प्रभाव से पार्किंग संचालन का कार्य करने दिया जाए, अथवा उनकी जमा धनराशि ब्याज सहित वापस की जाए। ठेकेदारों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो वे उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर करने के लिए बाध्य होंगे।
नगर आयुक्त से हस्तक्षेप की मांग
प्रार्थना-पत्र में यह भी आग्रह किया गया है कि नगर आयुक्त स्वयं इस पूरे मामले में हस्तक्षेप करें और उच्च न्यायालय में नियुक्त अधिवक्ता से विधिक स्थिति स्पष्ट कराते हुए तत्काल उचित कार्रवाई सुनिश्चित करें। ठेकेदारों का कहना है कि वर्षों से लंबित यह मामला अब उनके लिए जीवन-यापन का संकट बन चुका है।
इस पूरे प्रकरण ने नगर निगम की कार्यप्रणाली और निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह है कि नगर निगम प्रशासन इस विवाद पर क्या रुख अपनाता है और ठेकेदारों को कब तक न्याय मिल पाता है।