पार्ट–2
कानपुर स्वास्थ्य विभाग में प्राइवेट कर्मचारी से जुड़े इस मामले में अब नए खुलासों ने पूरे सिस्टम पर और गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ताजा जानकारी में सामने आया है कि जिस सरकारी बंगले में वह दबंगई के बल पर रह रहा है, वह महज़ एक “ढाल” है। वास्तव में उसका अपना मकान बर्रा में है, जिसे उसने किराए पर दे रखा है, जबकि करोड़ों की वसूली से इकट्ठा की गई राशि को वह वहीं सुरक्षित रखता है। सूत्रों के मुताबिक, ऐसा इसलिए ताकि किसी दिन सरकारी बंगले पर छापा पड़े तो कोई ठोस सबूत न मिले।विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि उसकी पूरी गतिविधि एक संगठित नेटवर्क की तरह चलती है। किस अस्पताल से कितनी रकम वसूली गई और किसे कितना हिस्सा पहुँचाना है—इसका पूरा हिसाब वह व्हाट्सऐप कॉल, ऑफ़लाइन मीटिंग और नकद लेन-देन के जरिए संभालता है, जिससे वसूली का कोई डिजिटल सबूत न रहे।अस्पताल संचालकों का आरोप है कि वह अपने संबंधों का डर दिखाकर निरीक्षण के नाम पर वसूली करता है। हूटर लगी गाड़ी में घूमना, अधिकारियों के साथ निरीक्षण टीमों में शामिल होना और सीधी धमकी कि “मेरे खिलाफ शिकायत करोगे तो अस्पताल सील करा दूँगा”— उसकी रूटीन कार्यशैली बताई जाती है। कई संचालकों ने दावा किया कि वह विभागीय अधिकारियों की निजी बातचीत रिकॉर्ड कर उन्हें भी दबाव में रखता है।लगातार शिकायतों के बाद अब कई अस्पताल संचालक और स्वास्थ्य कर्मी पूरा ब्योरा जिलाधिकारी को देने की तैयारी कर रहे हैं। इसमें बर्रा वाले मकान, सरकारी बंगले का अवैध कब्जा, करोड़ों की रिकवरी, ब्लैकमेलिंग, और अस्पताल सील कराने की धमकियों से जुड़े साक्ष्य शामिल किए जा रहे हैं। अब सबकी नजर इस पर है कि
क्या जिला प्रशासन इस पूरे मामले में सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई करेगा, या फिर यह मामला भी विभागीय लीपापोती के अंधेरे में ही गुम हो जाएगा।