ईडी और सीबीआई अधिकारी बनकर दिया था गिरफ्तारी का डर, चार शिकायतों में 1.42 करोड़ से अधिक की ठगी का खुलासा
कानपुर। वरिष्ठ चिकित्सक को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) का अधिकारी बनकर डिजिटल अरेस्ट करने और 48 लाख रुपये की ठगी के मामले में साइबर क्राइम पुलिस को एक और सफलता मिली है। पुलिस ने बिहार के सहरसा निवासी राजीव रंजन को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया कि डॉक्टर से ठगी गई रकम उसके बैंक खाते में पहुंची थी। पुलिस ने आरोपित के पास से तीन मोबाइल फोन भी बरामद किए हैं। इस मामले में पुलिस अब तक चार आरोपितों को गिरफ्तार कर चुकी है, जबकि एक अन्य की तलाश जारी है।
स्वरूप नगर निवासी वरिष्ठ चिकित्सक योगेश चंद्र मिश्रा को साइबर अपराधियों ने फोन कर पहले खुद को प्रवर्तन निदेशालय और बाद में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो का वरिष्ठ अधिकारी बताया था। आरोपितों ने उन्हें गंभीर आपराधिक मामले में फंसाने और गिरफ्तारी की धमकी देकर डराया। इतना ही नहीं, परिवार के सदस्यों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई। लगातार फोन कर मानसिक दबाव बनाया गया और किसी अन्य व्यक्ति से संपर्क करने अथवा पुलिस को जानकारी देने से मना किया गया। इस तरह साइबर अपराधियों ने डिजिटल अरेस्ट का झांसा देकर डॉक्टर से अलग-अलग बैंक खातों में करीब 48 लाख रुपये ट्रांसफर करा लिए। पीड़ित की शिकायत पर साइबर क्राइम थाने में मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने जांच शुरू की। जांच के दौरान बैंक खातों, मोबाइल फोन, कॉल रिकॉर्ड और डिजिटल लेन-देन का तकनीकी विश्लेषण किया गया। इसमें पता चला कि ठगी की रकम कई बैंक खातों के माध्यम से अलग-अलग स्थानों पर भेजी गई थी। इसी कड़ी को जोड़ते हुए पुलिस बिहार के सहरसा जिले के सलखुआ निवासी राजीव रंजन तक पहुंची। जांच में उसके बैंक खाते में इस प्रकरण से संबंधित करीब 48 लाख रुपये पहुंचने की जानकारी सामने आई। इसके बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। अब पुलिस खाते में आई रकम के आगे हुए लेन-देन और अन्य लोगों से उसके संपर्कों की पड़ताल कर रही है।
फर्जी फर्म बनाकर खुलवाए बैंक खाते
पुलिस की जांच में साइबर ठगी की रकम को इधर-उधर भेजने के लिए फर्जी फर्म और बैंक खातों के इस्तेमाल का मामला भी सामने आया है। गिरोह के सदस्य कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार कर बैंक खाते खुलवाते थे। इसके लिए आधार कार्ड, पैन कार्ड समेत अन्य दस्तावेजों में हेरफेर कर खुद को प्रतापगढ़ का निवासी दर्शाया गया। इसी आधार पर बीएयूकोयो कॉन्ट्रैक्टर्स प्राइवेट लिमिटेड नाम से फर्जी फर्म तैयार कर उसके नाम पर बैंक खाता संचालित किया गया।
जांच में इस फर्म के बैंक खाते में 15 अलग-अलग लेन-देन के माध्यम से करीब 25 लाख 98 हजार 200 रुपये आने की जानकारी मिली। इसके बाद इस रकम को 611 लेन-देन के जरिये दूसरे बैंक खातों में स्थानांतरित किया गया। पुलिस को आशंका है कि इस तरह कई खातों की श्रृंखला बनाकर साइबर ठगी की रकम को अलग-अलग जगह भेजा जाता था, जिससे रकम के वास्तविक स्रोत और उसमें शामिल लोगों की पहचान छिपाई जा सके।
पहले तीन आरोपितों की हो चुकी गिरफ्तारी
इस मामले में साइबर क्राइम पुलिस पहले ही वासु निवासी नवाबगंज, आतिश कुमार निवासी रायबरेली और कंचन प्रजापति निवासी कैंट, कानपुर नगर को गिरफ्तार कर चुकी है। अब बिहार निवासी राजीव रंजन की गिरफ्तारी के बाद मामले में एक और कड़ी जुड़ गई है। विवेचना के दौरान मुकुल चौबे निवासी कानपुर नगर का नाम भी सामने आया है, जिसकी पुलिस तलाश कर रही है। गिरफ्तार आरोपितों के मोबाइल फोन से मिली व्हाट्सएप बातचीत, कॉल रिकॉर्ड और अन्य डिजिटल साक्ष्यों को भी जांच में शामिल किया गया है। पुलिस इन साक्ष्यों के आधार पर गिरोह के नेटवर्क और उसकी कार्यप्रणाली का पता लगाने में जुटी है।
चार शिकायतों में 1.42 करोड़ से अधिक की ठगी
बैंक खातों और मोबाइल फोन के तकनीकी विश्लेषण के दौरान पुलिस को दूसरे राज्यों में दर्ज साइबर अपराधों से जुड़े होने के भी संकेत मिले हैं। राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर उपलब्ध शिकायतों की पड़ताल में उत्तर प्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र समेत विभिन्न स्थानों से संबंधित चार शिकायतें सामने आई हैं। इन शिकायतों में संबंधित बैंक खातों के माध्यम से करीब एक करोड़ 42 लाख 68 हजार रुपये की साइबर ठगी से जुड़ी रकम का विवरण मिला है।
पुलिस अब इन शिकायतों और बैंक खातों के बीच संबंधों की जांच कर रही है। साथ ही यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि ठगी की रकम किन-किन खातों में भेजी गई और इस पूरे नेटवर्क में अन्य कौन-कौन लोग शामिल हैं। गिरफ्तार आरोपितों से मिले डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर गिरोह के दूसरे सदस्यों की भूमिका की भी पड़ताल की जा रही है। पुलिस का कहना है कि साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।