राष्ट्रीय महिला आयोग के ‘शक्ति और सुरक्षा’ कार्यक्रम में जेंडर-सेंसिटिव पुलिसिंग, जीरो एफआईआर, घरेलू हिंसा, साइबर अपराध, पीड़ित प्रतिकर और महिला संबंधी कानूनों पर दो दिवसीय क्षमता संवर्धन प्रशिक्षण शुरू, प्रदेशभर से पहुंचे करीब 200 पुलिस अधिकारी
कानपुर। महिलाओं एवं बालिकाओं की सुरक्षा, सम्मान और न्याय तक उनकी प्रभावी पहुंच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा आयोजित ‘शक्ति और सुरक्षा’ विषयक दो दिवसीय क्षमता संवर्धन कार्यक्रम का शुभारंभ गुरुवार को पुलिस कमिश्नरेट कानपुर स्थित रागेंद्र स्वरूप सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स ऑडिटोरियम में हुआ। कार्यक्रम का आयोजन राष्ट्रीय महिला आयोग, महिला एवं बाल सुरक्षा संगठन उत्तर प्रदेश पुलिस तथा पुलिस कमिश्नरेट कानपुर के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य महिला संबंधी अपराधों की विवेचना करने वाले पुलिस अधिकारियों में लैंगिक संवेदनशीलता विकसित करना, कानूनों की बेहतर समझ बढ़ाना तथा पीड़ित महिलाओं को त्वरित और प्रभावी न्याय दिलाने की प्रक्रिया को और मजबूत बनाना है। कार्यक्रम में राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया राहतकर मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। उनके साथ पुलिस आयुक्त रघुबीर लाल, महिला एवं बाल सुरक्षा संगठन उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिरीक्षक सुभाष चंद्र दुबे, पुलिस कमिश्नरेट के वरिष्ठ अधिकारी तथा प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए पुलिस अधिकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन अपर पुलिस उपायुक्त महिला अपराध एवं मुख्यालय स्नेहा तिवारी ने किया।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया राहतकर ने कहा कि महिलाओं के प्रति संवेदनशील पुलिसिंग ही सुरक्षित और सशक्त समाज की सबसे मजबूत आधारशिला है। उन्होंने कहा कि महिला अपराधों के मामलों में केवल कानूनी कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि पीड़िता के प्रति मानवीय व्यवहार, संवेदनशील सुनवाई और समयबद्ध कार्रवाई भी उतनी ही आवश्यक है। उन्होंने पुलिस अधिकारियों से आह्वान किया कि प्रत्येक महिला शिकायतकर्ता को सम्मान और विश्वास के साथ न्याय दिलाने का प्रयास किया जाए, ताकि समाज में पुलिस के प्रति भरोसा और मजबूत हो सके।
पुलिस आयुक्त रघुबीर लाल ने कहा कि महिला संबंधी अपराधों की विवेचना में संवेदनशीलता, गुणवत्ता और समयबद्ध कार्रवाई पुलिस की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। उन्होंने कहा कि बदलते समय में अपराधों का स्वरूप भी बदल रहा है, इसलिए पुलिस अधिकारियों को लगातार प्रशिक्षण और नई कानूनी जानकारियों से अपडेट रहना आवश्यक है। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम पुलिसिंग को और अधिक प्रभावी, उत्तरदायी और जनविश्वास के अनुरूप बनाते हैं। महिला एवं बाल सुरक्षा संगठन के पुलिस महानिरीक्षक सुभाष चंद्र दुबे ने महिला एवं बाल सुरक्षा से जुड़े विभिन्न कानूनों, राज्य सरकार की प्राथमिकताओं और पुलिस की जिम्मेदारियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि महिला अपराधों के मामलों में त्वरित कार्रवाई, प्रभावी विवेचना और कानून का सही अनुपालन पुलिस की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
कार्यक्रम के तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञों ने पुलिस अधिकारियों को विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर प्रशिक्षण दिया। प्रथम तकनीकी सत्र में सेवानिवृत्त डीआईजी एवं एनआईए के पूर्व अधिकारी एन.एन. दुबे ने एफआईआर पंजीकरण और जीरो एफआईआर की अवधारणा पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि किसी भी महिला पीड़िता को थाने की सीमा का हवाला देकर लौटाना कानून के विरुद्ध है तथा प्रत्येक पुलिस अधिकारी का दायित्व है कि वह तत्काल एफआईआर दर्ज कर पीड़िता को न्याय दिलाने की प्रक्रिया शुरू करे।
दूसरे तकनीकी सत्र में वन स्टॉप सेंटर, लखनऊ की सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटर अर्चना सिंह ने जेंडर सेंसिटाइजेशन इन पुलिसिंग विषय पर प्रशिक्षण देते हुए महिला शिकायतकर्ताओं के प्रति व्यवहार, संवाद शैली, मनोवैज्ञानिक सहयोग और संवेदनशील पुलिसिंग के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि पुलिस का सकारात्मक व्यवहार पीड़ित महिलाओं में न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ाने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
इसके बाद विशेष न्यायाधीश (एनआई एक्ट) एवं सेवानिवृत्त अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश डी.पी. यादव ने पीड़ित प्रतिकर योजना के विभिन्न प्रावधानों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अपराध से प्रभावित महिलाओं और पीड़ितों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन भी न्याय प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
दिन के अंतिम तकनीकी सत्र में सेवानिवृत्त डीआईजी किरण ने घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न और पारिवारिक विवादों से जुड़े मामलों की विवेचना के दौरान पुलिस की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ संवेदनशीलता, धैर्य और निष्पक्षता भी अत्यंत आवश्यक है।
कार्यक्रम में पुलिस कमिश्नरेट कानपुर नगर, पुलिस कमिश्नरेट आगरा, आगरा जोन तथा कानपुर जोन के विभिन्न जनपदों से आए लगभग 200 पुलिस उपाधीक्षक, निरीक्षक एवं उपनिरीक्षक स्तर के अधिकारियों ने सहभागिता की। प्रशिक्षण के दौरान महिला सुरक्षा, जेंडर-सेंसिटिव पुलिसिंग, महिला अपराधों की प्रभावी विवेचना, जीरो एफआईआर, पीड़ित प्रतिकर, घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, साइबर अपराध, सोशल मीडिया के माध्यम से महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराध तथा महिलाओं से संबंधित विभिन्न विधिक प्रावधानों पर विशेषज्ञों ने विस्तृत जानकारी दी।
आयोजकों ने बताया कि इस क्षमता संवर्धन कार्यक्रम का उद्देश्य पुलिस अधिकारियों की व्यावसायिक दक्षता बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें महिला अपराधों की जांच में अधिक संवेदनशील और प्रभावी बनाना है। कार्यक्रम के दूसरे दिन 10 जुलाई को साइबर अपराध एवं फॉरेंसिक जांच, सोशल मीडिया पर महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों की विवेचना, डिजिटल साक्ष्यों के संरक्षण, कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (POSH) कानून तथा पुलिस की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा विस्तृत प्रशिक्षण दिया जाएगा। उम्मीद जताई गई कि इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम महिला सुरक्षा को और अधिक मजबूत बनाने के साथ पुलिस व्यवस्था को भी अधिक जवाबदेह और संवेदनशील बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।