आरटीओ में फिटनेस जांच का खेल बेनकाब, बाबू-चपरासी चला रहे सिस्टम

बिना आरआई सड़क किनारे हो रही वाहनों की फिटनेस, नियमों को दरकिनार कर जनता की सुरक्षा से खिलवाड़

कानपुर-महानगर के आरटीओ कार्यालय में वाहनों की फिटनेस व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं शासन के सख्त निर्देशों के बावजूद, जमीनी हकीकत यह है कि जनता की जिंदगी से सीधे जुड़े इस संवेदनशील काम को महज एक ‘कागजी औपचारिकता’ बना दिया गया है मौके का आंखों देखा हाल बिना आरआई के ही निपट रही थीं औपचारिकताएं बुधवार सुबह लगभग 10 बजे पनकी स्थित ड्राइविंग टेस्ट ट्रैक के बगल में सड़क किनारे जो नजारा दिखा, वह आरटीओ की कार्यप्रणाली की पोल खोलने के लिए काफी था मौके पर एक कुर्सी पर बैठे एक ‘अधिकारीनुमा’ व्यक्ति तथा पुष्पेंद्र नामक चपरासी धड़ल्ले से वाहनों की जांच करते नजर आए वहीं, एक अन्य बाहरी व्यक्ति मोबाइल से वाहनों की तस्वीरें खींच रहा था सुपरफास्ट जांच फिटनेस की प्रक्रिया इतनी जल्दबाजी में चल रही थी कि किसी वाहन का नंबर तक विधिवत दर्ज होता नहीं दिखा, किसी वाहन का शीशा टूटा होने पर उसे बस ‘ठीक कराकर लाने’ की मौखिक बात कही जा रही थी और बाकी औपचारिकताएं पलक झपकते ही निपटाई जा रही थीं,
बड़ा सवाल जब साहब गायब, तो फिटनेस कौन कर रहा था? जांच के दौरान जब मौके पर पड़ताल की गई, तो पता चला कि संबंधित आरआई (रीजनल इंस्पेक्टर) तब तक मौके पर पहुंचे ही नहीं थे ऐसे में कुछ तीखे सवाल खड़े होते हैं यदि तकनीकी जांच के लिए अधिकृत आरआई उपस्थित नहीं थे, तो फिटनेस परीक्षण का कार्य किसके आदेश पर और किसके भरोसे किया जा रहा था? क्या आरटीओ प्रशासन ने बाबू और चपरासी को वाहनों के तकनीकी परीक्षण का कानूनी अधिकार दे दिया है? यदि यह कार्य किसी सक्षम अधिकारी की ‘रिमोट निगरानी’ में हो रहा था, तो इसकी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? जिंदगी से खिलवाड़: सिर्फ फोटो खींचने का नाम ‘फिटनेस’? वाहन फिटनेस केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया या राजस्व वसूलने का जरिया नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर आम जनता की सुरक्षा से जुड़ा विषय है सड़क पर दौड़ने वाले ई-रिक्शा, कमर्शियल और निजी वाहनों के ब्रेक, लाइट, स्टीयरिंग, टायर और इंजन की सही जांच होना अनिवार्य है यदि फिटनेस की प्रक्रिया को मात्र ‘सड़क किनारे फोटो खींचने’ और ‘सरसरी निगाह डालने’ तक सीमित कर दिया जाएगा, तो अनफिट वाहन सड़कों पर काल बनकर दौड़ेंगे इसका खामियाजा निर्दोष राहगीरों को अपनी जान देकर भुगतना पड़ सकता है। योगी सरकार के सुशासन को चुनौती! उत्तर प्रदेश की योगी सरकार लगातार पारदर्शिता, जवाबदेही और ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत सुशासन का दावा करती है लेकिन कानपुर आरटीओ में नियमों की खुलेआम उड़ती धज्जियां स्थानीय अधिकारियों की कार्यशैली पर बड़ा बट्टा लगा रही हैं जनता का सवाल
अब कानपुर की जनता यह जानना चाहती है कि आरटीओ की यह वाहन फिटनेस वास्तव में सड़क सुरक्षा का ‘गारंटी पत्र’ है या फिर भ्रष्टाचार और लापरवाही की आड़ में छिपी सिर्फ एक ‘कागजी खानापूरी’? उच्च अधिकारियों को इस मामले का संज्ञान लेकर मौके पर मौजूद कर्मचारियों और जिम्मेदार लोगो पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि व्यवस्था में सुधार हो सके

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