कृषि विज्ञान केंद्र दिलीप नगर के प्रशिक्षण में वैज्ञानिकों ने मृदा परीक्षण, जैविक खाद और वर्मी कंपोस्ट की दी जानकारी
कानपुर नगर। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर के अधीन संचालित कृषि विज्ञान केंद्र, दिलीप नगर द्वारा ग्राम करोम में “उर्वरकों के संतुलित प्रयोग” विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को आधुनिक खेती, मिट्टी की सेहत और उर्वरकों के वैज्ञानिक उपयोग के प्रति जागरूक करना था। प्रशिक्षण कार्यक्रम में गांव और आसपास के क्षेत्रों से आए 30 से अधिक किसानों ने भाग लेकर खेती से जुड़ी नई तकनीकों और वैज्ञानिक जानकारी को समझा।
कार्यक्रम के दौरान कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को बताया कि लगातार रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित हो रही है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ने के साथ-साथ फसल की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है। वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की कि वे पारंपरिक खेती के साथ वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाएं।
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. शशिकांत ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि किसी भी फसल की बुवाई से पहले मिट्टी का परीक्षण कराना बेहद आवश्यक है। उन्होंने बताया कि मृदा परीक्षण से यह पता चलता है कि खेत की मिट्टी में कौन-कौन से पोषक तत्वों की कमी है। उसी के आधार पर यूरिया, डीएपी और पोटाश जैसे उर्वरकों का संतुलित प्रयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बिना परीक्षण के अधिक मात्रा में रासायनिक खाद डालने से मिट्टी की गुणवत्ता खराब होती है और फसल उत्पादन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने किसानों को जैविक खेती की ओर भी ध्यान देने की सलाह दी। डॉ. शशिकांत ने कहा कि गोबर की खाद, हरी खाद और जैविक उर्वरकों के नियमित प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है। इससे खेत की नमी संरक्षण क्षमता भी बढ़ती है और रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होती है।
प्रशिक्षण कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिक डॉ. निमिषा अवस्थी ने किसानों को उर्वरकों के सही समय और सही मात्रा में उपयोग की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जलभराव या तेज बारिश के दौरान यूरिया का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसी स्थिति में नाइट्रोजन का अधिक नुकसान होता है और किसानों को आर्थिक हानि उठानी पड़ती है। उन्होंने किसानों को रासायनिक खादों के साथ गोबर की खाद का संतुलित उपयोग करने की सलाह दी ताकि मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहे।
डॉ. अवस्थी ने किसानों को वर्मी कंपोस्ट तैयार करने की तकनीक भी समझाई। उन्होंने बताया कि किसान छोटे स्तर पर वर्मी यूनिट स्थापित कर घर पर ही जैविक खाद तैयार कर सकते हैं। इससे खेती की लागत कम होगी और फसल उत्पादन में सुधार आएगा। उन्होंने किसानों को आगामी खरीफ सीजन में धान की सीधी बुवाई तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि इस तकनीक से श्रम और पानी दोनों की बचत होती है तथा उत्पादन लागत भी कम आती है।
कार्यक्रम के दौरान किसानों ने वैज्ञानिकों से खेती में आने वाली समस्याओं को लेकर सवाल पूछे, जिनका विशेषज्ञों ने विस्तार से समाधान बताया। किसानों ने प्रशिक्षण कार्यक्रम को उपयोगी बताते हुए कहा कि ऐसी कार्यशालाएं उन्हें आधुनिक खेती अपनाने में मदद करती हैं।
कार्यक्रम के अंत में कृषि विज्ञान केंद्र के अधिकारियों ने किसानों से वैज्ञानिक पद्धति अपनाकर खेती करने और मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने की अपील की।