एनसीईआरटी को कानूनी नोटिस

कानपुर के अधिवक्ता विश्वजीत पॉल ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद एनसीईआरटी को कानूनी नोटिस भेजते हुए कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की नई पुस्तक में न्यायपालिका से जुड़े अध्याय पर कड़ी आपत्ति जताई है। अधिवक्ता ने स्पष्ट किया है कि यदि तीन दिन के भीतर इस संबंध में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो एनसीईआरटी के खिलाफ न्यायालय में मुकदमा दाखिल किया जाएगा।
अधिवक्ता विश्वजीत पॉल का कहना है कि एनसीईआरटी द्वारा कक्षा 8 की पुस्तकों में न्यायालय से संबंधित अध्याय में भ्रष्टाचार, लंबित मामलों का बोझ और न्यायाधीशों की कमी जैसे विषयों को शामिल किया गया है, जो बच्चों के मन में न्यायपालिका के प्रति नकारात्मक छवि प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि यह विषयवस्तु छात्रों के मन में न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा कर सकती है, जो समाज और लोकतंत्र के लिए घातक है।
विश्वजीत पॉल ने मीडिया से बातचीत में कहा कि यदि पाठ्यक्रम में न्यायपालिका की चुनौतियों पर चर्चा की जा रही है, तो उसी तरह कार्यपालिका और विधायिका में व्याप्त भ्रष्टाचार पर भी समान रूप से अध्याय शामिल किए जाने चाहिए थे। केवल न्यायपालिका को ही कटघरे में खड़ा करना न तो संतुलित है और न ही शैक्षिक दृष्टि से उचित।

उन्होंने आरोप लगाया कि एनसीईआरटी ने सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और निचली अदालतों में लंबित मामलों को दर्शाकर न्यायालय के कार्यों पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं, जिससे विद्यार्थियों का न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा कमजोर हो सकता है। अधिवक्ता का कहना है कि बच्चों को न्यायपालिका की भूमिका, उसकी संवैधानिक जिम्मेदारियों, न्यायिक अधिकारियों के कर्तव्यों और न्याय दिलाने की प्रक्रिया के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए था, न कि “करप्शन और न्यायतंत्र” जैसे अध्याय के माध्यम से नकारात्मक संदेश दिया जाना चाहिए।

विश्वजीत पॉल ने यह भी कहा कि उन्होंने एनसीईआरटी को विधिवत कानूनी नोटिस के साथ-साथ ई-मेल के माध्यम से भी अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। नोटिस में मांग की गई है कि न्यायपालिका से जुड़े अध्याय में “भ्रष्टाचार” जैसे शब्दों और संदर्भों को हटाया जाए या पाठ्यवस्तु में संतुलित संशोधन किया जाए।
अधिवक्ता ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि एनसीईआरटी ने तीन दिन के भीतर इस अध्याय में आवश्यक बदलाव नहीं किए, तो उनके पास कानूनी कार्रवाई के कई विकल्प खुले हैं और वे न्यायालय की शरण लेकर एनसीईआरटी के खिलाफ मुकदमा दायर करेंगे।
इस पूरे मामले ने शिक्षा जगत और विधि क्षेत्र में नई बहस को जन्म दे दिया है। जहां एक ओर पाठ्यक्रम में यथार्थवादी दृष्टिकोण शामिल करने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर बच्चों की मानसिकता और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। अब सभी की नजर एनसीईआरटी के अगले कदम पर टिकी हुई है।

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