अस्पताल संचालक चाहे चढ़ जाएँ सूली प्राइवेट कर्मचारी की जारी है जम के वसूली

मनीष गुप्ता

कानपुर। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कथित अवैध वसूली कांड में हाल के दिनों में लगातार नए मोड़ सामने आ रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि शुरुआती खुलासों को हल्के में लेने वाले अब अचानक सतर्क हो गए हैं, क्योंकि जांच की आंच उन लोगों तक भी पहुंच सकती है जो अब तक पर्दे के पीछे थे।

सूत्रों के मुताबिक शिकायत-पत्र में नए साक्ष्य जोड़े जाने के बाद कई लोग अपने पुराने मोबाइल, चैट और लेन-देन के रिकॉर्ड मिटाने में लगे बताए जा रहे हैं। आरोप है कि यह कथित सिस्टम सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें कई स्तरों पर “मैदानी खिलाड़ी” और “संरक्षण कवच” शामिल थे।

प्राइवेट कर्मचारी पर गंभीर आरोप, 2019 की नियुक्ति के बाद ‘नेटवर्क’ फैलाने का दावा

आरोप है कि 2019 में कोरोना काल में मदद के लिए नियुक्त एक प्राइवेट कर्मचारी ने विभागीय गोपनीय जानकारियाँ इकट्ठा कर धीरे-धीरे खुद को सिस्टम में इतना मजबूत कर लिया कि वह अस्पताल, पैथोलॉजी और क्लिनिक रजिस्ट्रेशन तक में दखल देने लगा।
सूत्रों के अनुसार यह कर्मचारी एक एसीएमओ के करीबी संपर्क में आकर रजिस्ट्रेशन संबंधी कार्यों में सक्रिय हुआ और कंप्यूटर सेक्शन में बैठकर अस्पताल संचालकों के खिलाफ साजिशी तरीके से कार्रवाई कराने लगा।

सबसे सनसनीखेज आरोप यह है कि वही प्राइवेट कर्मचारी आईजीआरएस का काम भी संभालता है तथा अस्पतालों के खिलाफ फर्जी शिकायतें बनाकर ब्लैकमेलिंग करता है। मछरिया क्षेत्र के एक अस्पताल संचालक ने इसकी शिकायत सीएमओ से की थी, लेकिन आरोप है कि कर्मचारी की “ऊपर तक पकड़” होने के कारण कोई कार्रवाई नहीं हुई।

संपत्ति, दवा फर्म और सरकारी बंगले पर कब्जे के आरोप भी surfaced

सूत्र बताते हैं कि कथित रूप से यह कर्मचारी पत्नी के नाम करोड़ों की संपत्ति खड़ी कर चुका है। एक दवा की फर्म भी उसकी पत्नी के नाम रजिस्टर्ड बताए जाने का आरोप है।
साथ ही सरकारी बंगले पर कब्जे के मुद्दे में डीएम का आदेश बंगला खाली कराने के लिए जारी हो चुका है। कर्मचारियों के अनुसार यह व्यक्ति अक्सर जिला प्रशासन की बैठकों और योजनाओं में ऐसे बैठता है मानो वह विभागीय अधिकारी हो।

अस्पताल संचालकों का आरोप है कि वह होटल-टाइप नंबर प्लेट लगी गाड़ी में अस्पतालों पर छापे जैसी कार्रवाई करवाने पहुंचता है और बाद में संचालकों को अलग बुलाकर मोटी रकम मांगता है।
सूत्रों के अनुसार कुछ अधिकारी उसकी कॉल रिकॉर्डिंग के कारण दबाव में रहते हैं, इसलिए खुली कार्रवाई नहीं कर पाते।

‘एक लाख रुपये से शुरू होती है घूस’, संविदा कर्मी ने लगाया आरोप

सीएमओ कार्यालय में तैनात एक संविदा कर्मचारी ने नाम न बताने की शर्त पर दावा किया कि “हर काम की शुरुआत एक लाख रुपये से होती है।”
हालाँकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

बड़ा सवाल—क्या जड़ तक पहुंचेगी जांच?

सीएमओ मामले को संज्ञान में ले चुके हैं, प्राइवेट और संविदा कर्मचारी अपनी-अपनी सफाई दे रहे हैं, और कुछ लोग कानूनी सलाह लेकर मुद्दा डिप्टी सीएम तक ले जाने की तैयारी में हैं।

अब सवाल यह है कि क्या यह मामला स्वास्थ्य विभाग की कथित वसूली प्रणाली की जड़ों तक पहुंचेगा या फिर अन्य मामलों की तरह समय के साथ फाइलों में दब जाएगा।
सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में यह प्रकरण विभागीय और प्रशासनिक हलकों में बड़ा सिरदर्द बन सकता है।

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