कमज़ोर स्वास्थ्य व्यवस्था ने बढ़ाए झोलाछाप डॉक्टरों के हौसले

मनीष गुप्ता

कानपुर।
उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य प्रणाली आज एक गहरी विडंबना से गुजर रही है। ग्रामीण इलाकों से लेकर छोटे शहरों तक अब झोलाछाप डॉक्टरों का साम्राज्य तेजी से फैलता जा रहा है। ये ऐसे लोग हैं जिनके पास न तो मेडिकल डिग्री है, न किसी तरह का वैधानिक लाइसेंस, फिर भी ये खुद को “डॉक्टर” कहकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं — और जनता, मजबूरी में इन्हीं पर भरोसा करने को विवश है।

सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी, दवाओं का अभाव, सुविधाओं की दुर्दशा और जागरूकता की कमी ने इन नकली चिकित्सकों के कारोबार को बढ़ावा दे दिया है। आलम यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोरी का लाभ उठाकर ये झोलाछाप डॉक्टर 24 घंटे उपलब्ध रहने का दावा कर जनता का विश्वास जीत लेते हैं। लेकिन उनका गलत इलाज और घटिया क्वालिटी की दवाइयाँ कई बार मरीजों के जीवन के लिए खतरा बन जाती हैं।

स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही
स्वास्थ्य विभाग और निगरानी एजेंसियों की लापरवाही ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। प्रशासनिक आंकड़ों में इन फर्जी चिकित्सकों की कोई गणना नहीं है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि गांवों और कस्बों में असली डॉक्टरों से ज्यादा ‘झोला लेकर घूमने वाले डॉक्टर’ दिख जाते हैं।
कानूनी कार्यवाही और लाइसेंसिंग सिस्टम के अभाव ने इनके हौसले बुलंद कर दिए हैं। कुछ चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर सुविधाएँ व डॉक्टर पर्याप्त हों, तो जनता को झोलाछापों की शरण में नहीं जाना पड़ेगा।

स्वास्थ्य विभाग त्यौहारों में व्यस्त, जिम्मेदारी भूल गया
दीवाली के तोहफों और नजरानों की चमक में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी अपने मूल कर्तव्यों से दूर दिखाई दे रहे हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी करने वाली टीमें केवल कागजों में सक्रिय हैं। नतीजा यह है कि “फर्जी डॉक्टरों” का नेटवर्क गांव-गांव तक फैल चुका है।

विशेषज्ञों की राय
चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि झोलाछाप डॉक्टरों की समस्या पर केवल कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि जनता में स्वास्थ्य शिक्षा और जागरूकता भी जरूरी है। जब तक सस्ती और विश्वसनीय सरकारी चिकित्सा सुविधाएँ हर स्तर पर उपलब्ध नहीं होंगी, तब तक यह समस्या खत्म नहीं होगी।

जनस्वास्थ्य की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
सरकार को अब इस पर गंभीरता से कदम उठाना होगा कि आखिर कब तक जनता की जान जोखिम में पड़ती रहेगी?
क्या स्वास्थ्य विभाग अपने दायित्व को निभाएगा या फिर झोलाछाप डॉक्टरों का यह “साम्राज्य” यूं ही जनता की मजबूरी का फायदा उठाता रहेगा।

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