कानपुर।
कानपुर में कला अब कवच का रूप ले रही है। अधिक भीड़भाड़ वाले इलाकों में साधारण दीवारों को मच्छर-रोधी भित्ति-चित्रों में बदल दिया गया है। यह सार्वजनिक कला न केवल शहर को सजाती है, बल्कि निवासियों को बीमारियों के वाहकों से भी सक्रिय रूप से बचाती है। इन प्रभावशाली चित्रों का एक और गहरा उद्देश्य है—लिम्फैटिक फाइलेरिया (LF) से जुड़े मौन और कलंक को तोड़ना, जो उत्तर प्रदेश में एक गंभीर लेकिन अक्सर अनदेखी बीमारी है। लिम्फैटिक फाइलेरिया, जिसे आमतौर पर हाथीपांव कहा जाता है, परजीवी कृमियों के संक्रमण से होता है। ये कृमि संक्रमित मच्छरों के काटने से फैलते हैं। इन भित्ति-चित्रों की खासियत यह है कि इन्हें मच्छर-रोधी पेंट से बनाया गया है। ये न केवल लोगों को शिक्षित करते हैं, बल्कि उनकी रक्षा करते हैं और उन्हें कार्रवाई के लिए प्रेरित करते हैं। इससे भारत की फाइलेरिया के खिलाफ लड़ाई सड़कों और दीवारों पर जीवंत और अनदेखा करना असंभव हो जाती है।
फाइलेरिया से पीड़ित लोग अक्सर समाज से बहिष्कृत कर दिए जाते हैं और कलंक का बोझ उठाते हैं। एक आम धारणा यह भी है कि बीमार व्यक्ति को इलाज के लिए दवा की आवश्यकता नहीं होती। ये भित्ति-चित्र उस सोच को चुनौती देते हैं और अब लोगों को इस मुद्दे से मुंह मोड़ने नहीं देते। इन्हें भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों पर लगाकर यह सुनिश्चित किया भी जा रहा है कि रोकथाम, दवा सेवन और शुरुआती उपचार पर बातचीत रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा बने। यह पहल राज्य-स्तरीय बड़े अभियान से जुड़ी हुई है। केवल कानपुर में ही 10 अगस्त 2025 तक लगभग 25 लाख लोगों को घर-घर जाकर ट्रिपल-ड्रग थेरेपी (DEC, Albendazole, Ivermectin) दी गई। पूरे उत्तर प्रदेश में सरकार ने 27 जिलों में 35,000 दवा-वितरकों को तैनात किया है, जो स्कूलों, स्वयं-सहायता समूहों, राशन की दुकानों, नाइट चौपालों, नुक्कड़ नाटकों और MDA यात्राओं के माध्यम से जागरूकता और भागीदारी बढ़ा रहे हैं।
यह सिर्फ कला क्यों नहीं है
यह पहल केवल जागरूकता का माध्यम नहीं है—यह कार्रवाई का आह्वान है। भित्ति-चित्र समुदायों को मच्छरों से बचाते हैं, व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा देते हैं और स्थानीय भागीदारी को प्रोत्साहित करते हैं। भारत ने 2027 तक फाइलेरिया समाप्त करने का लक्ष्य रखा है, और इस दिशा में ये भित्ति-चित्र केवल पेंटिंग नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय आंदोलन के मील के पत्थर हैं। यह पहल दिखाती है कि कैसे रचनात्मक समाधान समुदायों को सार्थक संवाद में शामिल कर सकते हैं, जिससे फाइलेरिया को खत्म करने की दिशा में कार्रवाई करने की प्रेरणा मिलती है।
“कला के रंगों से तंदुरुस्ती का संग: कानपुर की अनोखी पहल”